राष्ट्रवाणी

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
अंग्रेजी और ब्यूरोक्रेसी एक-दूसरे के पर्याय हैं। जब तक इस देश की लगाम ब्यूरोक्रेसी के हाथों में रहेगी तब तक देश की छाती पर अंग्रेजी के घोड़े दौड़ते ही रहेंगे। इसके विपरीत हिन्दी भारतीयता की, राष्ट्रीय स्वाभिमान की, परंपरा और प्रगति की प्रतीक है। जिस दिन राजकाज की बागडोर हिन्दी के हाथ में आई, उसी दिन राष्ट्रीयता, भावात्मक एकता, मौलिक अनुसंधान और ठोस उपलब्धियों तथा विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति के पथ उजागर हो उठेंगे। हिन्दी विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की भाषा होने के कारण शीघ्र ही 'तीसरे विश्व' की संपर्क भाषा बनकर एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में विश्व-मंच पर अवतीर्ण हो जाएगी। वह क्षण विश्व-शांति और विश्वबंधुत्व के लिए एक ऐतिहासिक वरदान बन जाएगा।
राजनीति का मूल धर्म यद्यपि जन-सेवा है, लेकिन हमें यह नहीं भूल जाना चाहिए कि उसका नाम राजनीति है, समाजनीति, संस्कृतिनीति या भाषानीति नहीं है। राजनयिक पहले राज की बात सोचते हैं कि वह कैसे शांतिपूर्वक तरीके से चले और किस तरह उस पर उनका कब्जा बना रहे। इस रास्ते में जो भी वस्तु उनके लिए बाधा या असहज होती है, वे या तो उसे नष्ट कर देते हैं या फिर पंगु बनाकर एक कोने में पटक देते हैं। राज चलाने के लिए वे किसी से समझौता कर सकते हैं और किसी से संघर्ष भी कर सकते हैं। आज की राजनीति का स्वर संसारभर में भौतिक ही है। जिस रीति से भौतिक समृद्धि बढ़े वही उनका प्रथम कर्त्तव्य है। सांस्कृतिक, साहित्यिक और भाषायी प्रगति तो उनके लिए 'अघाये की ब्यालू' है। लेकिन जो राष्ट्र को व्यापक परिवेश में स्वीकारते हैं, जो उसकी आत्मा को पहचानते हैं अथवा जो सच्चे राष्ट्रीय स्वाभिमान से अनुप्राणित हैं, उनका यह काम नहीं कि सरकार के मुखापेक्षी बन जाएं। भारत में भारतीयता का, ऊंचे सिद्धांतों का, मानवता का, सदविचारों का और सत्साहित्य एवं सर्वसम्मत भाषा का प्रचार कभी किसी सरकार ने नहीं किया। यह कार्य किया है संतों ने, राष्ट्र-निर्माता और समाज-सुधारक नेताओं ने, या फिर धुन के दीवानों ने। हिन्दी को ही लें, आज हमारा मानस यह बन गया है कि हम कुछ न करें, सरकार और नेता हिन्दी के संबंध में यह करें और वह कर दें। जैसा हमने ऊपर कहा वैसे ही दोषारोपण की प्रवृत्ति हिन्दी के लोगों में बढ़ गई है- सरकार ने वह नहीं किया और यह नहीं करती, संस्थाओं ने वह नहीं किया और यह नहीं करतीं तथा हमें छोड़कर शेष सभी को वह करना चाहिए और यह करना चाहिए। लेकिन हम यह कभी नहीं सोचते कि हमारा भी कोई कर्तव्य है या नहीं ? हम लोग स्वयं अपनी सुविधा के लिए अंग्रेजी का व्यवहार करते हैं, लेकिन दूसरों के अंग्रेजी व्यवहार करने पर आपत्ति उठाते हैं।

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