राष्ट्रवाणी

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
जब तक वे चाहेंगे, अंग्रेजी चलती रहेगी, लेकिन शेष देश के सभी प्रदेशों को अपनी-अपनी भाषा और राजभाषा हिन्दी में काम करने पर तरह-तरह की कानूनी और गैरकानूनी रुकावटें आए दिन डाली जाती हैं। हम पूछना चाहते हैं कि हिन्दी-प्रदेशों में कार्य करनेवाले केंद्रीय सरकार के कार्यालय उन-उन प्रदेशों की सेवाओं के लिए हैं या केंद्र में बैठे हुए कुछ अंग्रेजीदां अफसरों की तानाशाही का हुक्म बजा लाने के लिए हैं ? यदि नहीं तो उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार आदि में केंद्रीय कार्यालय वहां की जनता के साथ हिन्दी में कार्य क्यों नहीं करते ? स्वतंत्रता के चौवन वर्ष बाद हिन्दी अभी तक केंद्रीय कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों तक ही क्यों सीमित है ? क्यों केवल हिन्दी-पत्रों का कृपापूर्वक हिन्दी में उत्तर दे देना ही उनके दायित्व की इतिश्री बन गया है ? क्यों अभी तक योजनाओं के प्रारूप, घोषणाओं और आदेशों के मूलरूप और सरकारी पत्रों के उत्तर पहले अंग्रेजी में ही तैयार होते हैं ? वास्तविकता तो यह है कि यद्यपि भारत सरकार की कथनी में राजकाज द्विभाषी है, परंतु करनी में अभी तक अंग्रेजी ही चल रही है। न कहीं त्रिभाषा सूत्र है और न द्विभाषा फार्मूला। कहने को हिन्दी और करने को अंग्रेजी। क्या इसी का नाम लोकतंत्र है ? लोकमत और लोकभाषा के निरादर से क्या लोकतंत्र की रक्षा हो सकेगी ? जब तक परदेशी की भाषा चलती रहेगी, तब तक स्वदेश में सच्चा लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सकता। समाजवाद का नारा भी तब तक खोखला है, जब तक भारतीय समाज को अपनी भाषा के द्वारा प्रेरित और प्रबुद्ध न किया जाए। हम सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की बात करते हैं और उसके लिए कष्ट तथा हानि भी सहते हैं, परन्तु परहेज हमें है तो सिर्फ भाषायी स्वावलंबन से। हमें तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि देश को राजनैतिक गुलामी से मुक्त करके हमारे लोगों ने अपने मन के बंध नहीं काटे हैं, उनका दिल और दिमाग अंग्रेजों के यहां गिरवी रखा हुआ है।
कहने को बहुत कुछ है, लेकिन परस्पर दोषारोपण से कोई लाभ नहीं। अगर हम प्रारंभ में ही हिन्दी के लिए चौदह वर्ष का स्वेच्छा वनवास स्वीकार न कर लेते और हिन्दी के प्रचार तथा राजभाषा के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी सरकार पर डालकर निश्चिंत न हो जाते तो आज हमें ये दिन न देखने पड़ते। अंग्रेजों की बनाई मशीनरी वाले शासन तंत्र से अंग्रेजी को उखाड़ फेंकना न तब संभव था और न आज सहज है।

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