राष्ट्रवाणी

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
हम देश को प्रांतीयता की परिधि में बांधना उचित नहीं समझते, परन्तु जिन्होंने भाषावार प्रदेशों की रचना करके, प्रदेशों से चुनकर आए संसद-सदस्यों के बहुमत के आधार पर सरकारों का निर्माण किया है, उन्हें यह सोचना चाहिए कि यदि समस्त हिन्दी-प्रदेश और देश के अन्य हिन्दी-प्रेमी प्रदेश तथा अंग्रेजी का समर्थन करने वाले एकाध प्रदेश में बसने वाले हिन्दी-प्रेमियों के मन में यदि लगातार हिन्दी की उपेक्षा के कारण कभी कोई विपरीत भाव पैदा होगया तो उस आक्रोश की भयंकर बाढ़ में किस-किसकी कुर्सी बचेगी, यह कौन कह सकता है ? जनता की आकांक्षा की निरंतर अवहेलना करना, उसकी आस्था को निरंतर आघात पहुंचाना, राष्ट्र के निर्माताओं और स्वप्नद्रष्टाओं के नामों का शोषण करते हुए उनके विचारों के साथ छल करना यदि देशद्रोह नहीं तो देश-प्रेम भी नहीं है। स्वराज्य के बाद की राजनीति ने बात तो की देश की एकता की, लेकिन काम प्रायः एकता को तोड़ने वाले ही किए हैं। राष्ट्र की एकता के प्रतीक होते हैं- राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्र-संस्कृति। आज की राजनीति सोचती है कि झंडा और राष्ट्रगान ही काफी है। जब राष्ट्रभाषा और सच्ची भावात्मक एकता के बिना देश चल रहा है तो हम यह व्यर्थ का सिरदर्द क्यों मोल लें ? मिश्रित संस्कृति और दुहरी भाषा-नीति से देश की एकता न कहीं कायम हुई है और न कभी कायम होगी। क्षमा कीजिए, हम अत्यंत संकोच के साथ यह कह रहे हैं कि स्वराज्य के बाद देश का पाला ऐसे राजनेताओं से पड़ा है जो भाषा के प्रश्न का सामना करने में अपने को समर्थ नहीं पाते। वे सदैव उससे कतराते रहे हैं। हिन्दी के प्रश्न को उन्होंने हमेशा टाला है और सदैव 'किन्तु, परन्तु' से काम लिया है। उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि भाषा मातृ-स्वरूपा है। उसके अस्तित्व में सपूतों की जाति कभी संदेह नहीं किया करती। परन्तु हमारे राजनीतिज्ञ भाषा के संबंध में अत्यंत संदेहास्पद रवैया अख्तियार किए हुए हैं। यदि ऐसा नहीं तो हम पूछना चाहते हैं कि पहले राजभाषा आयोग के बाद दूसरा और तीसरा आयोग क्यों नहीं बिठाया गया ? पहले आयोग की सिफारिशें और संसदीय समिति के निर्णय किन परिस्थितियों में और किन दबावों में होते हैं, इसको फिलहाल छोड़ दिया जाए तो हम यह पूछना चाहते हैं कि इन सिफारिशों पर क्या पूरे मन से अमल होता है ? उन निर्णयों के आधार पर जो राजभाषा संबंधी नियम-उपनियम बनाए गए हैं उनका परिचालन कब होता है और कब दबा दिया जाता है, इसकी जांच-पड़ताल कौन करे ? एक प्रदेश के कुछ मुट्ठीभर लोगों को यह आश्वासन दे दिया गया है कि

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