राष्ट्रवाणी

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
विनोबाजी ने अपने संत-स्वभाव के कारण हिन्दी के उपकार को सहज भाव से स्वीकार किया, परन्तु जिन्होंने हिन्दी से सर्वाधिक लाभ उठाकर अपनी और अपने दल की स्थिति को मजबूत किया, उन राजनीतिज्ञों की विडम्बना को हम किन शब्दों में व्यक्त करें ? ये महानुभाव हिन्दी में वोट मांगते हैं, परन्तु कुर्सी पर बैठते ही अंग्रेजी की हिमायत करने लगते हैं। जनता के सामने अंग्रेजी का समर्थन करने की तो हिम्मत जुटा नहीं पाते, किंतु अंग्रेजी-समर्थक अफसरों के सामने अपने को पढ़ा-लिखा सिद्ध करने और कुछ प्रदेशों के मुट्ठीभर हिन्दी-विरोधियों के सामने अल्पसंख्यकों की भाषा के संरक्षक और राष्ट्रीय एकता का दम्भ भरने के लिए राष्ट्रीय स्वाभिमान और अपनी शर्म को भी ताक पर रखकर कहते हैं कि हिन्दी किसी पर लादी नहीं जाएगी। कोई उनसे पूछे कि देश पर और देशी भाषाओं की छाती पर अंग्रेजी लादी जा रही है या हिन्दी ? स्वराज्य के बाद के हमारे शासकों ने हिन्दी की दुर्गति करने में अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। महात्मा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा कहा था, लेकिन हमारे ये उदारमना नेता देश की सभी छोटी-बड़ी भाषाओं को राष्ट्रभाषा कहते हैं। संविधान ने हिन्दी को राजभाषा कहा था, लेकिन आज के हमारे शासक और नेता दबी जुबान से, आंखें नीची करके कहते हैं- हां, हिन्दी इस देश की संपर्क-भाषा हो सकती है। इनके कोष में अंग्रेजी के लिए तो अमित आश्वासन भरे हुए हैं, किन्तु हिन्दी पर जो पिछले पांच-छः दशकों से घोर अन्याय हो रहा है उसका प्रतिकार करना तो दूर की बात है, उसके लिए कोई मीठा बोल भी इनके श्रीमुख से नहीं फूटता। कभी ये हिन्दी को क्लिष्ट और असरल कहते हैं, कभी संकीर्ण और दरवाजा बंद करके बैठी हुई भाषा बताते हैं। हिन्दी के चतुर्दिक बढ़ते हुए साहित्य और ज्ञान-विज्ञान के प्रकाशनों से अपरिचित ये लोग बड़े विश्वास के साथ फरमाते हैं कि हिन्दी तो केवल कविता-कहानी की भाषा है। इसमें तकनीकी और विज्ञान-साहित्य की पुस्तकें कहां हैं ? जिन्हें अपने प्रदेश की राजनीति की भी पूरी जानकारी नहीं है, वे संपूर्ण भारत की भाषायी जानकारी का ज्ञान बघारते हुए बतलाते हैं कि भारत की कई प्रादेशिक भाषाओं की क्षमता हिन्दी से बढ़ी-चढ़ी हुई है। भारत का स्वतंत्र कहा जानेवाला प्रेस भी ''नेता-वाक्य प्रमाण'' मानकर इन्हें सुर्खियों में छापता रहता है। अज्ञान का ऐसा चमत्कार हम भारत में ही देख सकते हैं, जहां नेता और मंत्री कुर्सी पर बैठते ही सभी विषयों के रातों-रात विशेषज्ञ बन जाते हैं और समाज, साहित्य तथा संस्कृति के विशेषज्ञों के प्रामाणिक निष्कर्षों की ओर भूले से भी यहां ध्यान नहीं दिया जाता।

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