राष्ट्रवाणी

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
हिन्दी-प्रदेशों ने तो उसके विपरीत एक राष्ट्रभाषा के निर्माण के लिए अपनी समर्थ भाषाओं की एक प्रकार से बलि ही दी है, नहीं तो विभूतिमयी ब्रजभाषा, जायसी और तुलसी की वाणी अवधी, चंदबरदाई से लेकर मीराबाई की राजस्थानी, महाकवि विद्यापति की मैथिली और लोक तथा साहित्य दोनों में समृद्ध भोजपुरी की क्षमता देश की अनेक प्रादेशिक भाषाओं से कम महत्त्व की नहीं थी। हिन्दी-प्रदेशों के बहुभाषा-भाषियों ने तो राष्ट्रभाषा के निर्माण के लिए आत्मत्याग का एक दुर्लभ उदाहरण देश के सामने प्रस्तुत किया है, जिसे आज की स्वार्थपरक राजनीति दुर्भाग्य से गलत चश्मे से देख रही है।
एक समय था जब उर्दू हिन्दी से अलग नहीं समझी जाती थी। पंजाबी की तरह वह भी हिन्दी की एक शैली थी। यह मान्यता आज के हिन्दी-प्रचारकों की नहीं है, इसके पीछे लगभग चार सौ वर्षों की पुरानी परंपरा है और अब से पांच-छः दशक पहले तक इस शैली-सिद्धांत को मान्यता भी प्राप्त थी। हिन्दी का नामकरण हिन्दीतर बंधुओं ने किया। इसके प्रचार का कार्य भी हिन्दीतर महामनाओं के द्वारा आगे बढ़ाया गया। यह आज की बात नहीं, स्वराज्य से भी दशाब्दियों पूर्व की बात है, जब पूर्वी भारत में ब्रह्‌मसमाज, दक्षिणी भारत में वैदिक समाज, पश्चिमी भारत में प्रार्थनासमाज और उत्तर पश्चिमी भारत में स्वामी दयानन्द का आर्यसमाज, हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानकर, चारों दिशाओं से हिन्दी के लिए अनथक कार्य कर रहे थे। हिन्दी को क्षेत्रिय सीमाओं में संकुचित करनेवालों को इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि हिन्दी के अंकुर दिल्ली, जयपुर, लखनऊ, पटना और भोपाल के बजाय स्वातंत्र्‌य-युद्ध का पहला शंख फूंकने वाले बंगप्रदेश में अंकुरित हुए थे। बीसवीं शताब्दी में स्वराज्य के बाद अंग्रेजी की हिमायत करनवालों की सेवा में हमारा निवेदन है कि सन्‌ 1826 में 'उदन्त मार्तण्ड', सन्‌ 1829 में 'बंगदूत', सन्‌ 1850 में 'सुधाकर' तथा सन्‌ 1854 में 'समाचार सुधा-वर्षण' नामक हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएं सबसे पहले बंगभूमि से ही प्रकाशित हुई थीं। जब देश में राष्ट्रीय आंदोलन पूरे वेग पर था तो स्वयं स्वर्गीय चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य ने तमिलनाडु के गांव-गांव में घूमकर हिन्दी का प्रचार किया था। अगर हिन्दी साम्राज्यवादिनी होती तो अंग्रेजी साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंकनेवाले लोकमान्य तिलक, लाला लाजपतराय, विपिनचंद्र पाल और महात्मा गांधी इसके समर्थन में असाधारण रूप से आगे बढ़ते ? स्वामी दयानंद की भाषा तो गुजराती थी, वह क्यों अपना 'सत्यार्थ प्रकाश' हिन्दी में लिखते ? क्यों उनका आर्यसमाज हिन्दी-प्रचार को अपना प्रमुख उद्देश्य बनाता ? अगर महर्षि दयानंद को यह ज्ञात होगया होता कि हिन्दी काशी-प्रयाग के सनातनी पंडितों और पंडों की कट्टरता और संकीर्णता की प्रतीक है तो वह क्रांतद्रष्टा महर्षि हिन्दी के झमेले में कदापि न पड़ता। श्री पुरुषोत्तमदास टंडन की घर की जुबान भी अवधी थी।

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