राष्ट्रवाणी

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
हिन्दी केवल मातृभाषा नहीं, भारत की राष्ट्रवाणी है- वह वाणी जो राष्ट्र की आत्माभिव्यक्ति है, उसके विचारों-संस्कारों की प्रवाहिका है। वह प्रेम और सेवा की प्रतीक है। उसे शासकों ने नहीं गढ़ा, न सत्ता ने फैलाया। वह झोंपड़ी से गांव में, गांव से कस्बे में, कस्बे से नगर अर्थात्‌ जन-पथ से होकर राज-पथ की ओर अग्रसर हुई है। इसने अपना पथ सत्ता या श्रीमंतों की पालकी पर बैठकर तय नहीं किया। यह संतों के साथ-साथ भारत के सुदूर तीर्थों की लंबी-लंबी यात्राओं पर गई है। कवियों, समाज-सुधारकों, राष्ट्रनेताओं की वाणी बनकर हिन्दी ने जन-जागरण, स्वातंत्र्य समता और लोकतंत्र का अलख जगाया है। हिन्दी का बीज गमलों में नहीं सींचा गया। इसकी देख-रेख और बढ़ोतरी किसी नर्सरी में नहीं हुई। अश्वत्थ वृक्ष की तरह हिन्दी का बीज सदैव विषम परिस्थितियों में भी सहजभाव से फूटा है। बाहर की बड़ी-बड़ी शिलाओं ने सोचा कि वह हिन्दी के बीज को नहीं पनपने देंगी, लेकिन हिन्दी के अंकुर सदैव चट्टानों की दरारों के बीच से अंकुरित हुए हैं। हिन्दी के वट-वृक्ष ने अपनी छाया से पत्थरों को भी शीतल किया है। हिन्दी क्लेशकर नहीं, तापहर है। यह पत्थर मारने वालों को भी फल देने वाली है।
हिन्दी एक ओर गुरु नानकदेव की भाषा है तो दूसरी ओर अमीर खुसरो, जायसी, खानखाना रहीम, रसखान और इंशाअल्लाखां की भी भाषा है। इसलिए हिन्दी का संबंध केवल हिन्दुओं से जोड़ना या उसे हिन्दी-प्रदेशों की भाषा कहना उसके साथ अन्याय करना है। राष्ट्रीय परिवेश में देखें तो सिंध की सिंधी, पंजाब की पंजाबी, कश्मीर की कश्मीरी, असम की असमिया, बंगाल की बंगला, उड़ीसा की उड़िया, भारत के मलय प्रदेश की मलयालम, तेलंगाना की तेलुगू, तमिलनाडु की तमिल, महाराष्ट्र की मराठी और गुजरात की गुजराती भाषाएं पहले भी प्रचलित थीं और आज भी प्रचलित हैं। हिन्दी-प्रदेशों में तब भी और आज भी हरियाणवी, राजस्थानी, ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मैथिली आदि भाषाएं और बोलियां पहले भी चलती थीं और आज भी प्रचलित हैं। हिन्दी-प्रदेशों के शासकों, नेताओं और भाषाविदों ने अपने तथाकथित साम्राज्य का विस्तार करने के लिए या अपनी ज्ञात अथवा अज्ञात किन्हीं महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए हिन्दी को मढ़ा हो, ऐसा कहीं देखने या सुनने में नहीं आया।

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