कहां लौं कहिए ब्रज की बात

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
जो निश्चय ही कालांतर में यह सिद्ध करने में समर्थ होंगे कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, इतिहास और कलाओं का केंद्र पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से अधिक वास्तविक रूप में ब्रजभूमि में ही अवस्थित था और है।

वैदिक अवधारणा के अनुसार ब्रज गोलोक रहा है। यहां के लंबे-लंबे सींगोंवाली पुष्ट गायों, गोचर-भूमि और मनोरम प्राकृतिक छटा को देखने के लिए देवता भी तरसते थे। वैष्णवों के मतानुसार भी ब्रज भूतल पर गोलोकधाम है। मथुरा बैकुण्ठपुरी है। गोपियां वेदों की ऋचाएं हैं। ग्वालबाल वैकुंठनाथ के पार्षदों के रूप में यहां अवतरित हुए थे। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो पश्चिम की ओर से आने वाले आक्रांताओं ने जब तक दिल्ली और आगरा अर्थात ब्रज क्षेत्र पर फतहयाबी हासिल नहीं कर ली, तब तक वे जहांपनाह, शहंशाह और अकबर नहीं बन पाए। डच, पुर्तगाली और फ्रांसीसी छोटे-छोटे क्षेत्रों पर कब्जा करके बैठ गए और ब्रज की ओर नहीं बढ़े तो उन्हें महत्व नहीं मिला। अंग्रेज भी जब तक कलकत्ता को राजधानी बनाए रहे, भारत के शासक नहीं हो सके। ब्रज को कब्जाकर ही जब उन्होंने दिल्ली-तख्त को कायम किया, तभी उन्हें भारतेंदु का आशीर्वाद प्राप्त हुआ- 'पूरी अमी की कटोरिया सी चिरजीवी रहौ विक्टोरिया रानी।' तभी रवींद्रनाथ ठाकुर ने ब्रिटिश सम्राट की स्तुति में वह गीत गाया जो आज भारत का राष्ट्रगान बना हुआ है-'जन-गण-मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता।'

ब्रज एक भावलोक

क्यों भारत का जन-गण-मन ब्रज वसुंधरा की ओर आकृष्ट हुआ ? क्यों शताब्दियों तक ब्रजभाषा भारत की साहित्यिक भाषा रही ? क्यों उसके दोहे, सवैये, कवित्त और छंद भारतीयों के कंठहार बन बैठे ? क्यों भारतीय संगीत ने अद्यतन अपनी गायकी के लिए ब्रजभाषा को वरण कर रखा है ? क्यों भारत के लाखों-लाखों लोग प्रतिवर्ष ब्रज की ओर अनंत कष्ट और असुविधाएं झेलकर भी दौड़ते हैं ? क्यों प्रदूषण से युक्त यमुना और कुंड-सरोवरों में आचमन और स्नान करके अपने को धन्य मानते हैं ? ब्रज-रज जहां अब कहने को ही बची है, क्यों उसमें लेट-लेटकर गिरिराज गोवर्धन की सात कोस की दंडौती परिक्रमा करते हैं ? क्यों गर्मियों में छोटे से नाले की तरह बहने

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