कहां लौं कहिए ब्रज की बात

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
जि मन करै है कै जा अग्रलेख कूं अपनी मिठबोलनी, रसघोलनी ब्रजभाषा में ही च्यौं न लिखैं ? परंतु नहीं, भारत के राष्ट्रीय जागरण और हिन्दी के अरुणोदय की बेला में ही हमारे अग्रचेता पूर्वजों ने यह अलिखित समझौता और दृढ़ संकल्प कर लिया था कि भाई, तुम लिखो गद्य और हमसे बन पड़ेगा तो रचते रहेंगे पद्य। संवर्धन रहा आज से हिन्दी के लिए और संरक्षण रहा ब्रजभाषा के लिए। संप्रेषण हिन्दी का और सर्वेक्षण ब्रजभाषा का। इस तरह प्रयाग पहुंचते-पहुंचते ही ब्रज की कलित कालिंदी राष्ट्रभाषा की पावन गंगा में स्वेच्छा से समाहित हो चुकी थी। पूर्वजों के ऐसे ऐतिहासिक समझौते और शुद्ध संकल्प को हम तोड़ेंगे नहीं। माना कि ब्रज हमारे रोम-रोम में बसा है, चित्त पर चढ़ा है और उसके साहित्य की सुधराई तथा ब्रज की लुनाई हम पर ऐसी छाई है कि 'मन ह्‌वै जात कालिंदी के तीर।' जैसे-जैसे हम ब्रज-रस में पैठते हैं, उसकी चंद्र सरोवर में अवगाहन करते हैं, गोवर्धन गिरिराज महाराज की परिक्रमा देते हैं, ब्रज-साहित्य का अवलोकन करते हैं, उसके स्वर्णिम अतीत में झांकते हैं तो मन वृंदावन हो जाता है। xमथुरा मनोहर लगने लगती है। गोकुल, नंदगांव, बरसाना, परम रासस्थली अर्थात वृंदावन का परमानंद और महारास हमारी मनोभूमि पर अवतरित हो जाता है। बांसुरिया बज उठती है। मोर नाचने लगते हैं। कोकिल कूकने लगती है। यमुना लहर-लहर हो जाती है। धौरी-धूमर और काजर गायें कहीं हूकती और कहीं हूलती दिखाई देती हैं, तो कहीं बछिया-बच्चे उछल-कूद मचाते मिलते हैं। तरु, लता, गुल्म, कुंज और कुटीर, सर-सरोवर, मंदिर-मठ, टीले, स्तूप, हरीभरी छोटी-छोटी पहाड़ियां, कोरे और भोरे ग्वाल तथा गौरी और चिरकिशोरी गोपियां एवं उनके सर्वस्व युगल प्रिया-प्रियतम राधाकृष्ण हमारे मन के हिंडोले पर ऐसे झूलने लगते हैं कि जैसे महाकवि देव कह रहे हों-'झूलत है हियरा हरि कौ, हिय मांहि तिहारे हरा के हिंडोरे।'
ब्रज ससीम नहीं, असीम है।

लोग ब्रज को सीमाओं में बांधते हैं। कोई कहते हैं कि गोकुल ही ब्रज है।

पृष्ठ-1

| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
1    2    3    4   5   6
   | वेब निर्माण टीमः हैश नेटवर्क |