समय की देन हूं मैं

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
कला को जनरंजन के साथ-साथ जनमानस को बदलने वाला और क्रांतिवाहिनी होना चाहिए। कला कला के लिए नहीं होती। कला की सार्थकता मानवता या कहें कि समाज के लिए है। मैंने समय की मांग को यथासंभव पूरा करने का प्रयत्न किया है। उसमें कहां तक सफल हुआ हूं और किस प्रकार विफल हुआ हूं, इसे पीछे मुड़कर देखने या परखने का काम मेरा नहीं है। यह काम समय का है। वही यथासमय इसका निर्णय करेगा।
राष्ट्र के जागरण के साथ-साथ उन दिनों राष्ट्रभाषा के अभ्युदय का भी समय था। हिन्दी के सभी पुराने कवियों की तरह मैंने भी ब्रजभाषा और ब्रज-साहित्य को अपनाया। मेरी कविता भी ब्रजभाषा से प्रारंभ हुई। ब्रजभाषा में कितनी कविताएं लिखीं, उनकी गिनती करके आपको बताने से क्या लाभ ? पर जैसे ही मुझे ज्ञात हुआ कि मेरी ब्रज-कविताएं पुरानी परिपाटी और परवर्ती कवियों का चर्वित चर्वण हैं तो जैसे ही सुयोग मिला, मैं खड़ीबोली हिन्दी की ओर प्रवृत्त होगया। देशभक्ति के गीत लिखे। छायावादी टाइप की कुछ रचनाएं भी लिखीं। परंतु सोचा कि साहित्य की इस ऐतिहासिक धरोहर को प्रसादजी, पंतजी और महादेवीजी वर्मा के पास ही रहने दूं। यह दुःसाध्य कार्य मेरे वश का नहीं है। क्योंकि अधिकतर ऐसी रचनाएं स्वान्तः सुखाय भाव से ही लिखी गई हैं। जन-साधारण से इनका कुछ लेना-देना नहीं है। तभी अचानक व्यंग्य-विनोद के धनुष-बाण मेरे हाथ लग गए और मन ने गुनगुनाया, "हास्य सोने की अंगूठी, व्यंग्य सांवरौ नगीना है। बस तब फिर क्या था ! मेरी कलम से हास्य के फूल बरसने लगे और मेरे तरकस से व्यंग्य के तीर छूटने लगे। साठ बरस से अधिक समय तक मैं निरंतर व्यंग्य-विनोद लिखता रहा हूं। गुणवत्ता की बात आप जानें, लेकिन परिमाण में मैंने इतना लिखा है कि अब उसे समेटना दूभर होगया है।
कविता साहित्य की ऐसी विधा है जो सहज में ही लोकप्रियता प्राप्त कर लेती है। रसिकों का कंठहार बन जाती है। कवि को सिद्धि और प्रसिद्धि प्रदान करती है। मैंने कविता के द्वारा देश के कोने-कोने में ही नहीं, विदेशों में जहां-जहां भारतीय बसते हैं या देश-विदेश के अहिन्दीभाषी लोगों से वह सब प्राप्त किया जो कवि-जीवन की सार्थकता के लिए शायद बहुत दिनों तक स्मरण किया जाता रहेगा। परंतु कविता सूत्र है। वह बिम्बों और प्रतीकों द्वारा तादात्म्य स्थापित करती है। लेकिन मेरी समझ से यह ऐसी विधा है, जिसमें बहुत कुछ अनकहा रह जाता है।

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