समय की देन हूं मैं

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
मैं समय हूं। समय से ही धरती पर आया और समय चुकने के साथ ही चला भी जाऊंगा। मैंने समय को परखा है। समय पर चूका भी नहीं हूं। समय को कभी व्यर्थ नहीं गुजरने दिया। उस ज़माने में समय ऐसा ही था, जब एक से एक बढ़कर समाजसेवी, सामयिक तपस्वी और कंकड़-पत्थरों की तरह मणि-माणिक्य बटोरने वाले ही नहीं, महात्मा गांधी जैसे अवतारी महापुरुष, पंडित नेहरू जैसे जननायक, शास्त्रीजी जैसे देश पर निछावर होने वाले, इंदिराजी जैसी दुर्धर्ष और साहसी नेता, एक से एक बढ़कर क्रांतिकारी और इनसब में अग्रगण्य नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे बलिदानी व्यक्तित्व समय की सामयिकता को सार्थक कर रहे थे।
समय ने मुझे चेताया कि स्वदेश, स्वभाषा, स्वसंस्कृति और इन सबका मार्गदर्शन करने वाला साहित्य प्रतीक्षारत है। यदि खड्ग नहीं उठा सकते तो तलवार से भी ज्यादा धारदार कलम को उठाओ।
मैंने कलम उठाई तो समय ने चेतावनी दी कि हे पृथ्वी-पुत्र, देश की धरती से जुड़ो। धरती पर असंख्य दीन-हीन, अभावग्रस्त, रूढ़ियों में फंसे, पाखंडों में घिरे लोग विसंगति और विषमता का असहनीय त्रास भोग रहे हैं। उनकी ओर देखो। मत देखो आकाश की ओर। चार दिन की चांदनी दिखाकर निरंतर घटने वाले चंद्रमा या चंद्रमुखियों के चक्कर में मत पड़ो। तुम आकाश के तारे गिनने के लिए पैदा नहीं हुए हो। विधाता ने तुम्हारी कलम को साहित्य का सौभाग्य सुलभ किया है। वह साहित्य जो राज और समाज का मार्गदर्शन करता है। वह साहित्य जो क्रांति के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। अपनी कलम को, अपनी कला को इधर मोड़ो।
मुझे सूत्र याद आया-स्वान्तः सुखाय। तो पाया कि मूर्तिकार यद्यपि अपनी कलाकृति को अपने मन के सुख के लिए गढ़ता है, पर उसकी स्थापना अपने घर में नहीं करता। चित्रकार बड़ी लगन से, मानसिक उल्लास से, विविध रंगों के संयोजन से मनमोहक चित्र बनाता है, पर उसे अपनी बैठक में नहीं टांगता। गायक और वादक की स्वान्तः सुखाय भाव से अहर्निश स्वर-ताल-साधना की सार्थकता केवल उन तक सीमित नहीं रहती। इसी प्रकार कवि और लेखक स्वान्तः सुखाय भाव से एकाग्रचित्त होकर अपनी रचनाधर्मिता का निर्वाह करता है, परंतु घर की दीवारों को सुनाने के लिए नहीं।

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