व्यंग्य-विनोद : शास्त्र से लोक तक

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
बाजार में जो माल बिकता है, वही बनाते हैं। लेकिन प्राचीन हिन्दी-साहित्य में ऐसा नहीं था। तुलसीदासजी ने शिव-पार्वती विवाह, परशुराम-लक्ष्मण संवाद, अंगद-रावण संवाद तथा स्थान-स्थान पर जो व्यंग्य-विनोदपूर्ण चुटकियां ली हैं, वे हिन्दी साहित्य की निधि हैं। सूरदासजी यद्यपि विशुद्ध भक्तकवि थे- विनय, भक्ति और दासवृत्ति ही उनके अभीष्ट लेखकीय विषय थे, परंतु ब्रज की मस्ती भी उनके पदों में जहां-तहां बोल ही पड़ती है, जैसे- 'श्याम पिबइया घी कौ' अथवा 'गजी फटी और पौ'। लेकिन रीतिकालीन ब्रज-साहित्य में हास्यरस में मौलिक लेखन नहीं हुआ। अधिकतर संस्कृत के हास्यपरक श्लोकों का भाषांतर हुआ है।, जैसे-
"विधि, हरि, हर बढ़ि इनते न केऊ,
तेऊ खाट पै न सोवैं खटमलन के डर ते।"
अथवा कंजूसों, मनहूसों, काने-कुरूपों पर ही भौंडे कवित्त लिखे गए हैं। परंतु कुछ कवियों ने यमक द्वारा, शब्द-श्लेष द्वारा कभी-कभी बड़े मौलिक छंद भी लिख डाले हैं, जैसे-

"चींटी न चाटत, मूसे न सूंघत,
बास तैं माछी न आवत नेरे।
आनि धरे जब तैं घर में,
तब तैं रहे हैजा परोसिन घेरे।
माटिहु में कछु स्वाद मिलै,
इन्हैं खाय कैं ढूंढत हर्र-बहेरे।
चौंकि पर्‌यो पितलोक में बाप,
सपूत के देखि सराध के पेरे।"
अथवा
"सूम सिरोमणि नागो लला
कन्हराय खुराय तुला पै चढ़ायौ।
चाउर की कनकी किनकी अरु,
उर्द की चुन्नी सैं पल्ला भरायौ।
बालक तोल में भारी भयौ
तब याकौ उपाय यही ठहरायौ।
मूंड मुड़ाय कैं, दस्त कराय कैं,
फस्त खुलाय कैं, पूरौ करायौ।"

सूम-शिरोमणि का एक उदाहरण और लीजिए। वह लक्ष्मी से कहता है-

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