व्यंग्य-विनोद : शास्त्र से लोक तक

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
  1. उपहसित - इसमें नथुने फूल जाते हैं। सिर और कंधे सिकुड़ जाते हैं तथा दृष्टि कुछ वक्र हो जाती है। यह भी मध्यम श्रेणी के लोगों के योग्य होता है।
  2. अपहसित -यह हास अधम कोटि का माना जाता है। इसमें हंसते-हंसते आंखों में पानी आ जाता है। सिर और कंधे स्पष्ट रूप में हिलने लगते हैं तथा हंसते-हंसते मनुष्य पेट पकड़ लेता है।
  3. अतिहसित - इसे भी अधम कोटि का हास माना गया है। इसमें हास्य के सारे लक्षण और परिणाम बहुत ही स्पष्ट होते हैं। इसे अट्टहास भी कह सकते हैं।
संस्कृत-नाट्यशास्त्रों में हास्य की अभिनय योग्य दृष्टि को 'हास्या' कहते हैं। संस्कृत नाटकों में तो हास्य सोने में सुहागे के समान है। प्रायः सभी संस्कृत नाटककारों ने एक ऐसे मनोरंजक पात्र की कल्पना की है जिसकी परंपरा बाद के हिन्दी-नाटकों और लोक-लीलाओं में आज तक अक्षुण्ण रूप से विद्यमान है।
इसे विदूषक कहते थे जो नायक का अत्यंत विश्वासपात्र सहयोगी और उसके दूषणों को भी अपने मीठे वचनों से परिष्कृत करने वाला तथा देखने में अज्ञ और वास्तव में विज्ञ हुआ करता था। वह हर संकट में नायक के साथ नहीं, आगे रहता था। उसकी पहुंच रनिवास तक थी। वह नायिकाओं और मित्रों के मनमुटाव को दूर करनेवाला होता था। वह भविष्य की चेतावनी देने वाला होता था और वर्तमान का मार्गदर्शक भी होता था। लेकिन विडंबना देखिए कि उसे पेटू, मूर्ख, नक्काल और अपने शब्दों से ही नहीं, करतबों से भी दर्शकों के समक्ष अटपटे काम करने वाला बताकर विदूषक शब्द को आज विकृत कर दिया गया है। उसे जब नाटकों में ही महत्वपूर्ण स्थान नहीं मिला तो साहित्य में क्या खाक मिलता ! उसे तो सिर्फ 'भाण' कहकर छोड़ दिया गया। उसने कुछ लिखा भी तो 'भड़उआ' कह दिया। आज के कविता-मंच पर जनता में हास्य की लहर फैलाने वाले और गंभीर कवियों के पैर उखाड़ने वाले हास्यकवियों को जोकर और चुटकुलेबाज बताकर साहित्य से बहिष्कृत कर दिया गया है, यानि जो जनता में लोकप्रिय है, उसे साहित्य से बहिष्कृत करने की ठान आज के तथाकथित कुसमालोचकों और कुबुद्धियों ने ठान ली है। इसमें हास्यरस के कवियों का भी दोष कम नहीं है। वे कमर्शियल होगए हैं।

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