व्यंग्य-विनोद : शास्त्र से लोक तक

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !

गुरोगिर्रः पंच दिनान्यधीत्य
वेदांतशास्त्राणि दिनत्रयं च ।
अमी समाघ्राय च तर्कवादान्‌
समागता कुक्कुटमिश्रपादा :॥

(अर्थात-यह देखिए, कुक्कुट मिश्र आए हैं। इन्होंने गुरु से कुल जमा पांच दिन शिक्षा पाई है। सारा वेदांतशास्त्र तीन दिन में पढ़ा है और तर्कशास्त्र तो फूल की तरह सूंघ डाला है।)
इसी प्रकार संस्कृत के 'सुभाषित रत्न भाण्डागार' में एक श्लोक आता है-
सामगानातिपूतं मे नोच्छिष्टमधरं कुरु ।
उत्कण्ठितासि चेद् भद्रे वामं कर्णं दशस्व मे॥
(अर्थात-एक अरसिक वैदिक ब्राह्मण किसी रमणी से कहता है- हे भद्रे ! मेरे ये ओंठ सामवेद का गान करते-करते बहुत पवित्र होगए हैं। इन्हें तुम व्यर्थ जूठे मत करो। यदि तुमसे किसी प्रकार रहा न जाता हो तो तुम मेरा बायां कान ही मुंह में लेकर चुभला लो।)
'सुभाषित रत्न भाण्डागार' का एक श्लोक और देखिए-
सदा वक्रः सदा क्रूरः सदा पूजामपेक्षते ।
कन्याराशिस्थितो नित्यं जामाता दशमो ग्रहः ॥
(अर्थात्‌- दामाद दसवां ग्रह है। वह सदा वक्र और क्रूर रहता है। सदा पूजा चाहता है और सदा 'कन्या' राशि पर स्थित रहता है।)
संस्कृत-साहित्य में इसी प्रकार के अनेक हास्य-संबंधी उदाहरण यत्र-तत्र खोज निकाले जा सकते हैं जो कालिदास के 'मेघदूत' में भी मिलेंगे। भारवि की अर्थवत्ता में भी पाए जा सकते हैं। 'मृच्छकटिकम्‌' नाटक में भी व्यंग्य-विनोद-संबंधी सामग्री मिलती है। परंतु संस्कृत के नाट्य साहित्य में व्यंग्य-विनोद के उदाहरण प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। हास्य के जितने भेद-प्रभेद हैं, इस प्रकार बताए गए हैं-

  1. स्मित - स्मित हास में गालों पर कुछ सिकुड़न पड़ती है। आंखें कुछ विकसित होती हैं। नीचे का ओंठ कुछ फड़कने लगता है। दांत दिखाई नहीं देते। दृष्टि कुछ कटाक्षपूर्ण हो जाती है। यह श्रेष्ठ लोगों के योग्य है।
  2. हसित - श्रेष्ठ लोगों के योग्य इस हसित हास में मुख, गाल और आंखें कुछ फूली सी दिखाई देती हैं। दांतों की पंक्तियां कुछ-कुछ नज़र आती हैं।
  3. विहसित - मध्यम श्रेणी के लोगों के योग्य इस विहसित नाम की हास-क्रिया में शब्द सुनाई देते हैं। इसमें आंखें कुछ सिकुड़ जाती हैं।

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