व्यंग्य-विनोद : शास्त्र से लोक तक

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
राजनीति के नए-से-नए आंदोलनों, समाज के अनुदिन के उतार-चढ़ावों, वैज्ञानिक विकृतियों, इतिहास के बदलते हुए पृष्ठों तथा दुनिया कहां जा रही है, सबकी प्रामाणिक जानकारी के प्रति ललक बनी रहनी चाहिए। जो आंख से नहीं देखता, कान से नहीं सुनता, समाज में घुसकर उसकी भलाई-बुराई को स्वयं अनुभव नहीं करता और जो संवेदनशील नहीं है, वह कभी व्यंग्यकार नहीं बन सकता।
यदि व्यंग्य-विनोद के साक्षात्‌ दर्शन करने हों तो लोक में रमिए। यहां पग-पग पर व्यंग्य-विनोद के कुसुम खिले हुए हैं। विवाह में ज्यौनार के समय पकवानों के साथ कन्या-पक्ष की नारियों की 'गालियों' का स्वाद भी चखिए। बारात के गांव से निकलने के बाद नारियों का 'खोइया' देखिए- इसमें नाटक का भी आनंद है और व्यंग्य-विनोद के साक्षात दर्शन भी। होली के अवसर पर यदि आपने पुरुषों को नाचते-गाते नहीं देखा तो क्या देखा। मिल जाएं तो ईसुरी की फाग, लखमीचंद की रागनियां, ख्यालबाजी, पढंत, ब्रज की तानें और धमार में जो व्यंग्य-विनोद समाहित है वह साहित्य में कहां ? पश्चात्ताप इस बात का है कि इस ओर हमारे सुधीजनों, समालोचकों और शोधकर्ताओं का ध्यान नहीं गया। ऐसी रचनाओं को एकत्र करके प्रकाशित नहीं किया गया। मैंने ब्रज, बुंदेलखंड, राजस्थान, मैथिल, पंजाब, हरियाणा और बंगाल की लोक-रचनाएं सुनी हैं और मन-ही-मन अनुभव किया है कि साहित्य का दृश्य और श्रव्य इस लोकानंद के पासंग में भी नहीं ठहरता। अघाने तापिए, चौपालों पर बैठिए, कुंड-सरोवरों पर व्यंग्य-विनोदी उपाख्यान सुनिए तो निश्चयपूर्वक कह सकता हूं कि आप मेरे इस कथन से सहमत हो जाएंगे। अंत में बरसाने की फाग का एक टुकड़ा निवेदित करता हूं-
"जो रस बरसाने में बरसै,
सो रस तीन लोक में नॉंय।"
तीन लोक की बात तो नहीं जानता, परंतु इस धरातल पर भले ही साहित्य में व्यंग्य-विनाद की कमी हो, लोकरस का निराला आनंद सर्वत्र गुलाब की कलियों की तरह चटख रहा है, मटक रहा है। व्यंग्य-विनोद के प्रेमियों के हृदय में रसानुभूति की तरह अटक रहा है। इसकी लटक को, इसकी लोच और लचक को जरा देखिए तो सही ! कहने का तात्पर्य यह है कि व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लेकर लोक तक सर्वत्र प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में विद्यमान है। देखने वाली आंख चाहिए। फिर कहता हूं--

दिल दे तो इस मिज़ाज़ का परवरदिगार दे,
जो रंज की घड़ियां भी खुशी से गुज़ार दे।                                        ('हास्य सागर' से, सन्‌ 1996)  

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