व्यंग्य-विनोद : शास्त्र से लोक तक

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
भारत सहित विश्व की सभी भाषाओं के विद्वानों, आलोचकों, हास्यरस की विवेचना करने वालों, उसके लक्षण और उदाहरण प्रस्तुत करने वालों ने इस रसराज हास्य की बहुविध और उदात्त स्वरों में मार्मिक व्याख्या की है। इन सबके अनुशीलन को मैं देख-सुन आया हूं और इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि हास्यरस चाहे जन्मजात या आनुवंशिक उतना न हो, जितना वह रचयिता के संस्कारों और परिस्थितिजन्य कारणों से उदभासित होता है।
हास्यरस करुणा से उत्पन्न होता है और उसका मुख्य लक्ष्य अनीति को उदघाटित करना है। यह भी एक व्यंग्य है कि साहित्य में दोष-दर्शन करनेवालों ने यह स्वीकार किया है कि विधाता की सृष्टि में जहां दोष और असंबद्धताएं पाई जाती हैं, वे सब हास्य के विभाव हैं।
मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि संस्कृत से लेकर विश्व की विशिष्ट भाषाओं में हास्यरस की महत्ता को तो स्वीकार किया गया है, उसके भेद और उपभेद भी बड़ी सूक्ष्मता से बताए गए हैं, लेकिन हास्य अधिकतर लक्षण-ग्रंथों तक ही सीमित रहा है। उसमें उत्कृष्ट साहित्य की रचना नहीं पाई जाती। संस्कृत में वेदों की वचन-विदग्धता से लेकर भरत के नाट्यशास्त्र और संस्कृत के साहित्य-शास्त्र संबंधी 'साहित्य दर्पण' आदि में यही सब कुछ देखने को मिलता है। लेकिन एक बात स्वीकार करनी पड़ेगी कि इन साहित्य-शास्त्रियों और व्यंग्य-विनोद के विवेचकों ने अवश्य ही लेखकों का पथ-प्रदर्शन किया है।
महान दार्शनिक अरस्तू ने विनोद-वचन को काव्यशास्त्र के अंतर्गत नहीं, वक्तृत्व-शास्त्र में अलंकारशास्त्र के अंतर्गत माना है। उसने विनोद का समावेश वाइवासिटी अर्थात भाषा की प्रफुल्लता या तेजस्विता में किया है और चटकीले शब्द-प्रबंध के लक्षणों में हास्य का उल्लेख स्पष्ट रूप से किया है।
अरस्तू का मत है कि जिन ''चटकीले शब्द प्रबंधों' की लोग बहुत प्रशंसा करते हैं, वे अनुनयी और चतुर मनुष्यों द्वारा रचे हुए होते हैं।'' 'चमत्कृतिजनक रूपक' नाम का एक विशिष्ट प्रकार अरस्तू को बहुत पसंद था, जिसका वर्णन उसने इस प्रकार किया है- ''ऐसा आनंददायक समय ढूंढ निकालना जो पहले कभी न देखा गया हो।'' ऐसे चमत्कारिक और आनंददायक शब्द-प्रयोग से हास्यरस की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार कह सकते हैं कि अरस्तू द्वारा बताया गया 'चमत्कृतिजनक रूपक' निःसंदेह हिन्दी के 'चोज़' और अंग्रेजी के 'विट' की ही प्रतिकृति है।

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