वंदे हास्यरसम्‌ !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
अलग करके देखें तो हास्य मधुर और व्यंग्य थोड़ा कषाय। दिल्ली की चसकदार कॉफी की तरह कि जिसमें दूध भी है, क्रीम भी है, चीनी भी है और सुस्वादु चाकलेट पाउडर भी। इसके अलावा जो व्यंग्य है, उसका ढंग मुझे स्वीकार नहीं। वह या तो गाली-गलौज होता है या फिर उसका काम टांग खींचना या पगड़ी उछालना बन जाता है। साहित्य का मूल गुण शिष्टता या शालीनता है। उसका एकमात्र लक्ष्य मानवीय संवेदना की सरस अभिव्यक्ति है। लेकिन जैसे व्यंग्य का आज साहित्य में प्रचलन हो चला है, उसमें शील और सौजन्य, संवेदना और मानवता के दर्शन प्रायः कम ही होते हैं। वह समाज की संरचना में कम, उसकी विकृतियों के बहाने उसके विनाश की ओर अधिक उन्मुख दिखाई देता है। यह पश्चिमी के भौतिकवाद और उससे उत्पन्न असंतोष तथा विकृतियों की ही देन है। इसका हृदय-परिवर्तन में विश्वास नहीं। यह पुरातत्त्व के खंडहरों की मरम्मत करके उसे खड़ा रखना नहीं चाहता। विनाश के इस मसान पर सपनों के राजमहल खड़ा करके ही दम लेना चाहता है। गलत क्यों कहें, सामाजिक क्रांति का यह भी एक तरीका है। इसने कई जगह अभूतपूर्व सफलता भी प्राप्त की है। परंतु भारतीय संस्कृति और पुराने साहित्यिक एवं सामाजिक संस्कारों में पले मुझ-जैसे लोगों को आज यह रास नहीं आ रहा है। कल की कल जाने !
लीजिए, ऊपर मैंने बड़े-बड़े सिद्धांत बघार दिए। पर सिद्धांतों का बखान करना जितना आसान है, उन पर अमल करना उतना आसान नहीं। मैंने इन पर कितना अमल किया है और इसमें कितना सफल रहा हूं, यह बात न मैं जानता हूं और न कहूंगा। मेरे न रहने पर मेरा कितना साहित्य छनकर बचता है और समाज के पाठक और साहित्य के समीक्षक उसे किस रूप में स्वीकार करते हैं, यह वे जानें और उनका काम जानें। मैं तो इतना जानता हूं कि हास्यरस की पतवार लेकर मैं जीवन-नैया में सवार हुआ और हंसते-गाते उसे खूब खेया। पत्नीवाद चला या नहीं चला, चला तो कहां से कहां पहुंचा ? लेकिन उसके बहाने मैंने देश को लूटने वालों, सताने वालों और इस पर कब्जा बनाए रखने वालों की खूब खबर ली। लगे हाथ सामाजिक विषमताओं और अन्यायों की बात भी कहता गया। साहित्य में मैंने नई जमीन तोड़ी या नहीं, इसका पता तो ठीक से वे बताएंगे जिनकी भूमि पर मेरे हल चले हैं।

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