वंदे हास्यरसम्‌ !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
अगर कोई लगातार कोशिश करने के बाद भी सत्ता के शिखर तक नहीं पहुंच पाता तो यह करुणा का विषय है, हास्य का नहीं। बच्चे नहीं सुनते तो बुढ़िया टर्राती रहती है, बूढ़ा खांसता रहता है या बर्राता रहता है तो उसकी सेवा-सहायता कीजिए। उसे हास्यरस का आलंबन क्यों बनाते हैं ? इसी प्रकार असफल प्रेमी, उदास पति और निराश पत्नियों को हास-परिहास के दायरे में लाना उचित नहीं है। ये सब आपकी मानवीय संवेदना के अधिकारी है, परिहास के पात्र नहीं। हास्यरस तो व्यक्ति और समाज की असंबद्धताओं, विसंगतियों, अनाचार, पाखंड, मद और मत्सर जैसी तमसावृत वृत्तियों और घटनाओं के लिए ज्योतिर्मय अंजन है। उसका प्रयोग समाज के हित और परिष्कार के लिए कीजिए। व्यक्ति के सुधार के लिए उसे आजमाइए। यह प्रसन्नता बिखेरने वाली विधा है। इसमें कल्मष और कटुता को मिलाकर इसे अपवित्र, गंदला और प्रदूषित मत बनाइए।
हास्यरस समाज के लिए संजीवनी है और व्यक्ति के लिए जिंदादिली। इसीलिए एक लोकगायक हंसते-हंसाते बड़ी ऊंची बात कह गया है -
"हंस-बोल बखत कटि जायगौ,
जानैं को कितकूं रम जायगौ ?"
और व्यंग्य ? वही तो हास्य का वास्तविक रंग है। जैसे मोती में आब, पुष्प में पराग और तरुणियों की बड़ी-बड़ी अंखियों में चितवन का महत्त्व होता है, वैसे ही हास्य में व्यंग्य का महत्त्व है। जैसे नृत्य में तोड़, ताल, सम, संगीत में लयकारी का अपना एक अलग आनंद है, वैसे ही हास्यरस में व्यंग्य का अपना अलग मज़ा है। ये जो काव्यशास्त्र के श्लेष, अन्योक्ति, वक्रोक्ति आदि उक्तिवैचित्र्य हैं, वे व्यंग्य की परख के लिए ही स्थापित हुए हैं। रीति-साहित्य की लक्षणा और व्यंजना तथा विद्वज्जनों की जो वचन-विदग्धता है, वे चुटीले व्यंग्य के ही सरस उपादान हैं। जैसे गुलाब के पास कांटा, मयूर के पास पैनी चोंच और असुंदरियों के पास तीखे बोल होते हैं, वैसे ही हास्य के पास उसे धार देने के लिए सृष्टा ने व्यंग्य की व्यवस्था कर दी है। व्यंग्य न हो तो हास्य सपाट-बयानी बन जाए, अनर्गल हो जाए और बेतुका लगने लगे। चतुर्भुज विष्णु के हाथ में केवल नीलकमल ही नहीं, शंख, चक्र, गदा और शंख भी हैं। इसी प्रकार चक्रवर्ती हास्य के पास चोज़, आयरनी, तंज़ और व्यंग्य के आयुध रहते हैं। पर भयावह रूप में नहीं, दिव्य रूप में अत्यंत शोभायमान।

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