वंदे हास्यरसम्‌ !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
मैं हास्यरसावतार हूं और न हास्यसम्राट। आज के वैज्ञानिक युग में अवतारवादिता और लोकतंत्रीय व्यवस्था में साम्राज्य स्थापित करने की या उस पर डटे रहने की गुंजाइश ही कहां बची है ? जब मेरे लिए लोग इन विशेषणों का प्रयोग करते हैं तो मैं जानता हूं कि या तो वे मुझे मक्खन लगा रहे हैं अथवा मूर्ख बना रहे हैं। मैंने हिन्दी में हास्यरस का प्रारंभ किया है, यह कहना और समझना भी सही नहीं है। सच तो यह है कि मुझसे पहले बाबू भारतेन्दु हरिश्चंद्र (अंधेर नगरी चौपट राजा), प्रतापनारायण मिश्र, बाबू बालमुकुंद गुप्त (शिव-शंभु का चिट्ठा), जी0 पी0 श्रीवास्तव (दुमदार आदमी), अकबर इलाहाबादी आदि हास्य-पादप का बीजारोपण कर चुके थे। मेरे बारे में सही सिर्फ इतना है कि मैंने हास्यरस लिखा है और जिया भी है। साहित्य लिखना एक अलग बात है। उसे बहुतों ने लिखा है और लिखते रहेंगे। लेकिन साहित्यिक जीवन जीना शायद लेखन-कर्म से भी कठिन कार्य है। मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूं जो लिखने के लिए व्यंग्य-विनोद लिखते हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व में, परिवार में या सामाजिक परिवेश में उसका नामोनिशान नहीं मिलता। क्योंकि मैं पिछले पचास वर्षों से ऊपर इस 'हास्य-सागर' में अवगाहन करता रहा हूं, इसलिए हास्य मेरे जीवन का अंग बन गया है। मेरी रुचि, स्वभाव और संस्कार बहुत दिनों से ऐसे होगए हैं कि मैं जो लिखता हूं या कहता हूं और करता आया हूं, उसमें अनायास व्यंग्य-विनोद का पुट आ ही जाता है। इसके कारण मेरे कृतित्व और व्यक्तित्व के संपर्क में आने वाले लोग जहां गदगद होते हैं, मुस्कराते हैं और ठहाके लगाते हैं, वहां गंभीरता का मुखौटा पहने हुए कुछ लोग दुःखी भी कम नहीं होते। क्योंकि हास्य-व्यंग्य साहित्य की ऐसी मनमोहिनी विधा है कि इसको लिखने वाला जल्दी ही सिद्ध और प्रसिद्ध हो जाता है। इससे समानधर्मी लोगों और कुंठित व्यक्तित्वों में ईर्ष्या भी पैदा होती है। मैं भी जीवन में शायद इसी कारण ईर्ष्या का शिकार हुआ हूं। परंतु यह मेरे वश की बात नहीं। हां, इतना अवश्य कह सकता हूं कि मेरा मन जानबूझकर किसी के प्रति विकारी नहीं रहा। मैं उनके प्रति क्षमाप्रार्थी हूं, जिनके कदली-पत्र जैसे कोमल तथा भावुक मन को मेरे सहज-स्वभावी व्यंग्य-बाणों ने छेद दिया हो।

पृष्ठ-1

| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
1    2    3    4   5    6    7   8
   | वेब निर्माण टीमः हैश नेटवर्क |