ओम शान्ति !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
जो भी जड़-चेतन इस जगत में है, वह प्रकृति के नियमों से बंधा हुआ है। उन नियमों और उनके कारणों को जानकर ही हम व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और जगत का कल्याण कर सकते हैं। सबसे अद्यतन वैज्ञानिक खोज है कि हो न हो, कहीं कोई ज्योति-पुंज अवश्य है। प्रकाश का अक्षय केन्द्र है। उससे ही सृष्टि की उत्पत्ति, विकास और विनाश होता रहता है। उसी से ग्रह या लोक बनते-बिगड़ते हैं, उल्काएं टूटती हैं, सूर्य प्रकाशित होते हैं और ठंडे पड़ते हैं, ग्रह-नक्षत्र घूमते हैं, उसी एक धुरी पर। अब बताइए, किसकी बात पर विश्वास करें और कैसे उस ईश्वर को प्राप्त करें ? आदमी ने जबसे होश संभाला है, तभी से वह अदृश्य के प्रति जिज्ञासु रहा है। उसने सूर्य को नमस्कार किया। चंद्रमा के दिव्य प्रकाश को नमन किया। वरुण को, पवन को, धरित्री को, अग्नि को पहले ईश्वर माना, बाद में देवता कह दिया। फिर ब्रह्म्र माना और ''अथातो ब्रह्म्र जिज्ञासा'' शुरू हो गई।
मनु के पुत्र की ईश्वरीय रहस्य को भेदने, उसे खोजने और जानने की लगन जारी रही। समुद्र की उत्ताल तरंगों के ऊपर जब उसने नाचती हुई मछली को देखा तो कहा-यही ईश्वर है।
जब उसने हिरण्यकश्यप जैसे शक्तिशाली और प्रतापी राजा को एक सिंह जैसे नर द्वारा अपने नखों से विदीर्ण करते देखा, तब बोला- अब समझ में आया, यही ईश्वर है। जब कुठारधारी एक पराक्रमी ब्राह्‌मण ने इक्कीस बार इस धरती के योद्धाओं (क्षत्रियों) को अकेले पराजित कर दिया, तब उसने शक्ति-पुंज महाबली परशुराम को ही परमेश्वर मान लिया। लेकिन जब परशुराम के तेज को दाशरथी राम ने आत्मसात कर लिया और दण्डकारण्य में अकेले दस हजार आतंकवादियों को धराशायी कर डाला तथा उसके बाद विश्वविजयी, महापराक्रमी लंकाधिपति रावण को परिजन-पुरजन समेत नष्टकर सीता को छुड़ा लिया तो कौशल्या नंदन राम घट-घटवासी होगए। ''उठते राम, बैठते राम, सोते राम, जब बोलो तब रामहि राम, खाली जिह्‌वा कोने काम।'' राम जनजीवन में रम गए। लोगों ने कहा-अरे, यह तो राजा हैं। पर तुलसीदास ने उत्तर दिया-

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