ओम शान्ति !

भूमिका
वंदे हास्यरसम
व्यंग्य-विनोद शास्त्र से लोक तक
समय की देन हूं मैं
कहां लौं कहिए ब्रज की बात
राष्ट्रवाणी
हिन्दी चले तो कैसे चले
आपुन मुख हम आपुन करनी
यह विस्फोट अहम्‌ का है
तो सुनो मेरी कहानी
ओम शान्ति !
लिखते-लिखते लो उन्यासी वर्ष बीत चले। ऐसे बीते कि पता ही नहीं चला। अचरज होता है कि इतने दिन जिये तो कैसे! अपनी तरफ से तो कोई कसर छोड़ी नहीं। पिछले पचास वर्षों में मनों तंबाकू और टनों चाय के रूप में निकोटिन चूस लिया होगा, पी लिया होगा। आज भी उठते ही राम का नाम लेने से पहले चाय का नाम लेता हूं। फिर तंबाकू का पान जम जाता है, तब राम-कृष्ण का ध्यान आता है। कविता और पत्रकारिता तथा अल्हड़पन के साथ-साथ काम करने के दबाव ने मेरे जीवन को अनियमित बना दिया। बड़े गर्व के साथ कहता हूं कि भाइयो, मैं अनियमितताओं को बरतने के मामले में अत्यंत नियमित रहा हूं। शायद ही उन्यासी वर्ष का कोई ऐसा आदमी मिले जो दिन में कम से कम बीस प्याले चाय और तंबाकू के पच्चीस पान पी जाता हो, चबा जाता हो। जो ग्यारह बजे नाश्ता करता हो। तीन बजे से पहले लंच न लेता हो और रात का भोजन, मतलब कि डिनर ग्यारह बजे से पहले न करता हो। बुढ़ापे में जब मृत्यु का डर अधिक सताने लगता है और जीवन तथा जगत्‌ के प्रति मोह दिन-पर-दिन बढ़ता जाता है, तब ऐसे आचरण करने वाले व्यक्ति को आप क्या कहेंगे ? इस पर तुर्रा यह कि मैं सोलह घंटे हिन्दी के लिए काम करता हूं और अब राजधानी में हिन्दी का विश्वमंदिर बनवाने में जुटा हूं। मूर्ख कहीं का मैं ! ऐसे कर्त्ता-धर्त्ता न जाने कितने हुए हैं, कितने हैं और न जाने कितने आगे होंगे ? लेकिन वाह रे मेरे दंभ ! जो अपनी अक्षमताओं को भी गुण-गौरव प्रदान करने में बाज नहीं आता। लेकिन इतनी बात सच है कि जब वैद्यों ने बताया कि मुझमें तपेदिक के आसार बढ़ रहे हैं, तब मैं हंसा और हंसते-हंसते बिना किसी उपचार के तपेदिक को भगा दिया। जब आंखें जवाब देने लगीं, तब सोचा-व्यास, अब देखने को क्या बचा है ? देश-विदेश, नदी-सरोवर, वन-पहाड़, पुरातत्त्व के पवित्र स्थान, तीर्थस्थल, देश का कोई बड़ा नगर या कस्बा रह गया क्या देखने से ? अपने देखे, पराये देखे। सुंदर देखे, सुंदरियां देखीं। सिंह देखे, गीदड़ देखे। विषधर नाग देखे, बलखाती नागिनें देखीं। बहुतों को मित्र बनाकर देख लिया और शत्रु बनाकर भी। शिष्य बनाकर देख लिया और शिष्या बनाकर भी। परंतु जब देखा-

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