प्रियजनों की दृष्टि में

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !


श्री गोपालप्रसाद व्यास देश के उन सपूतों में से एक थे, जिन्होंने राष्ट्र और राष्ट्रभाषा की सेवा जीवन-धर्म मानकर की। हिन्द उनका साध्य था और हिन्दी साधन। हिन्द उनके लिए साधना था और हिन्दी सिद्धि। उनका जीवन और साहित्य राष्ट्रीयता के रंग में रंगा हुआ था। राष्ट्रभाषा के कार्य को उन्होंने देश-रचना के लिए ही अंगीकार किया। इसीलिए वह हिन्दी के आंदोलनकारी नेता नहीं, रचनात्मक कार्यकर्ता ही अधिक रहे।
व्यासजी ने भाषा और साहित्य दोनों की सेवा में अपने को खपाया। एक ओर वह उच्च कोटि के कवि, लेखक और पत्रकार थे, दूसरी ओर हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन, राजभाषा सम्मेलन और भारत सरकार की हिन्दी-सलाहकार समिति के पदाधिकारी तथा कर्मठ कार्यकर्ता भी। वह ऐसे साहित्यकारों में से नहीं थे, जो भाषा के स्वरूप, विकास और प्रतिष्ठा को विशेष महत्व नहीं देते। वह ऐसे भाषाई कार्यकर्त्ता भी नहीं थे, जिनका साहित्य से कोई वास्ता नहीं। व्यासजी हिन्द के लिए हिन्दी को ही नहीं, भाषा के लिए साहित्य और साहित्य के लिए भाषा को भी महत्त्वपूर्ण मानते थे। मानते ही नहीं, उसके लिए सक्रिय कार्य भी करते रहे। दिल्ली की राजधानी में स्थापित 'हिन्दी भवन' इसका साक्षात प्रमाण है।

व्यासजी जनता के आदमी थे और अपने साहित्य तथा सेवा-कार्य के लिए देश में अत्यंत लोकप्रिय रहे। लोक-रंजन उनके साहित्य का प्रमुख गुण था, पर उनके लोक-रंजन के पीछे राष्ट्र-निर्माण की एक गहरी टीस भी छिपी हुई थी, जो कभी व्यंग्य के रूप में व्यक्त होती रही, तो कभी सहज-विनोद के रूप में। उनका हास्य-रस एक प्रकार से समाज-परिष्कार का मधुर आंदोलन ही था। इसकी लपेट में राजनीति, अर्थतंत्र, साहित्य और समाज-रचना सभी कुछ आ जाता था।

व्यासजी को हिन्दी में हास्य-रसावतार और पत्नीवाद का प्रवर्तक माना जाता है। एक प्रकार से वह हिन्दी में हास्य-रस का प्रवर्तन करने वाले भी थे। उनका व्यंग्य-विनोद तीखा नहीं, मधुर था। वह स्वयं पर हंसकर दूसरों को हंसाते थे। उनके हास्य का केन्द्र-बिन्दु परिवार और विशेषकर पत्नी थी। व्यासजी ने अपनी पत्नी के माध्यम से समाज, साहित्य और भारत की राजनीति को बड़े मधुर उपालम्भ दिए। पद्य में ही नहीं, उनका साहित्य गद्य की विविध विधाओं में भी समर्थ रूप से प्रकट होता है। सजीवता और मौलिकता व्यासजी के साहित्य के दो आधार स्तंभ हैं। उनके साहित्य का प्रकाश केवल हिन्दी में ही नहीं, गुजराती, मराठी, बंगला, कन्नड़, तमिल, अंग्रेजी और रूसी भाषा में भी अनूदित होकर फैला। व्यासजी हमारे युग की एक अनुपम देन थे। ऐसी देन, जिसने भाषा, साहित्य, समाज और राजनीति पर चतुर्दिक अपना प्रभाव डाला। समय-समय पर हिन्दी से जुड़े हुए प्रमुख हस्ताक्षर उनके व्यक्तित्व के बहुमुखी आयामों पर अपने विचार लिखते रहे हैं। प्रस्तुत हैं उनके विचार


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