व्यास का ब्रज-रंग

( डॉ0 नगेन्द्र )  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

पं. गोपालप्रसाद व्यास मूलतः ब्रजभाषा के कवि हैं। हास्यरस में तो वह बहुत बाद में आए। आज हिन्दी में उनके हास्य की चर्चा ही अधिक है, पर यह सत्य है कि ब्रजभारती भी इन्हें इतनी ही सिद्ध है। इन्होंनें ब्रजभाषा की प्रसिद्ध चटसार में पिंगल, अलंकार, रस और नायिका भेद आदि का परंपरागत अध्ययन किया है। यह चटसार थी मथुरा के 'भारतेन्दु समाज' के आचार्य कवि श्री नवनीत चतुर्वेदी की। किशोरावस्था में ही इन्हें रस-रीति के लक्षण उदाहरण सहित लगभग ढाई-तीन हजार कवित्त-सवैये कंठस्थ होगए थे। संस्कृत की भांति ब्रजभाषा का अध्ययन भी पहले इसी पढ़ंत-परिपाटी से हुआ करता था।
यही कारण है कि व्यासजी को छंद और ब्रजभारती की अजस्त्र माधुरी पर सहज अधिकार है। मंजे हुए छंदों में वह टकसाली ब्रजभाषा की परिपुष्ट मथुरा-वृत्ति से विलग नहीं होते। उनका समर्थ कलापक्ष भावानुगामी नहीं, विषय को चमत्कार प्रदान करने वाला होता है। व्यासजी की ब्रजभाषा गढ़ी हुई नहीं, अलंकृत या जड़ी हुई भी नहीं, सहज, सरल और बोधगम्य है। उन्होंने ब्रज की टकसाल से चालू सिक्के ही अपनाए हैं।
इस विभूतिमयी ब्रजभाषा को व्यासजी ने नानाविधि से संवारा-सहेजा है। परंपरागत रूप में सरस्वती, गणेश, नृसिंह, यमुना, गिरि गोवर्धन की वंदना के रूप में षट्ऋतु, नायिका भेद आदि का वर्णन रसिक और रसज्ञ के रूप में तथा हलधर, विनोबा और ब्रजवासी, कवि की योजना आदि आधुनिक प्रसंगों के रूप में। व्यासजी की यह विशेषता है कि वे प्राचीन विषयों को नवीन परिवेश में और नवीन विषयों को प्राचीन परिपाटी में प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए वाणी-वंदना करते हुए वह एक रूपक में कहते हैं-
घिरि आईं घटाएं बिचारन की,
जल धारन उक्ति जबैं सरसैं लगीं।
चमकी चपला चित व्यंग्य भरी,
धुनि-स्रेनी मरालन की दरसैं लगीं।
धुरबा छाए 'व्यास' विभूषन - से,
मुरवान का बानि कहान रसैं लगीं।
कवि मेघ के मंजु निनाद तैं यों,
कविता तैं सुधा बरसा बरसैं लगीं।

व्यास का कवि-मेघ भी सुधा-वर्षा करता है, मगर विचार और विवेक के साथ। उसका मन-मयूर रस की वाणी से कूकता है, मगर उक्ति, अलंकार, ध्वनि का ध्यान भी उसे है। कविता में बुद्धि-पक्ष व्यास की रचना में चमत्कार बनकर उतरा है। बुद्धि के देवता गणेश के विषय को कवि ने जो अपह्‌नुति अलंकार का आश्रय लेकर रूप प्रदान किया है, वह इस प्रकार है-

गज-मुख नाहिं, ये तौ धीर मति-गति वारे,
भाल चंद्र नाहिं ये तौ कीरति कौ चंदना।
मूसक सवारी नाहिं, ये आसन, सयानप पै,
नैन तीसरी है नाहिं, ग्यान-ज्योति बन्दना।
मोदक न मांगें, अनुरागे मोद ही सौं सदा,
देवन में गिरि-सृंग, गिरिजा के नन्दना।
'व्यास' के गनेस, याहि पूजत सुरेस ये तौ,
विघनेस नाहिं, मेरे विघन निकन्दना।

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