जिसकी कलम में जोर है

(भवानीप्रसाद मिश्र )  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

श्री गोपालप्रसाद व्यास को साधारणतया हिन्दी-संसार एक पत्रकार और हास्य के समर्थ कवि की तरह जानता-पहचानता है। किन्तु वह अन्य अनेक विधाओं और रसों में भी सफलतापूर्वक लिख लेते हैं-यानी ज़रूरत पड़ने पर। लेकिन आमतौर पर लोग उन्हें उसी प्रकार के प्रति अपने को प्रतिबद्ध मानते हैं, जो भाषा का प्राण है, अर्थात व्यंग्य। किन्तु ओज की भी उनके यहां कमी नहीं है। पद्य और गद्य, दोनों में ही गोपालप्रसाद व्यास ने ओजप्रद रचनाएं प्रस्तुत की हैं।
इन रचनाओं में एक तो खंडकाव्य ही है। इसका नाम है- 'कदम-कदम बढ़ाए जा', जिसमें नेताजी सुभाषचंद्र बोस और आज़ाद हिन्द फौज की वीरता की झांकियां पद्यबद्ध की गई हैं। इस पुस्तक की कविताएं क्रमशः दैनिक हिन्दुस्तान में रोज़-ब-रोज़ धारावाहिक रूप में छापी जाती थीं। उन दिनों अंग्रेज सरकार की अदालत में आज़ाद हिन्द फौज के कतिपय शूरवीरों पर मुकदमा चलाया जा रहा था। स्पष्ट है कि वातावरण उद्दीप्त था। इन रचनाओं ने उसमें घी का काम किया। दिल्ली के तत्कालीन अंग्रेज कमिश्नर ने पत्र के संचालकों से कहा कि इन रचनाओं का छापा जाना बंद कर दिया जाना चाहिए, किन्तु धमकी बेकार गई और रचनाएं क्रमशः छपती रहीं। बाद में वही रचनाएं पुस्तक रूप में प्रकाशित हुईं।
आज भी उन कविताओं को पढ़ने पर इस बात की सहज ही कल्पना की जा सकती है कि उस समय उनको पढ़कर और सुनकर जनता के मन में देशप्रेम की भावनाएं किस हद तक जाग्रत होती रही होंगी। कहा जाता है कि उन कविताओं के छपकर निकलते न निकलते तक वे उत्तरी-पश्चिमी भारत का कंठहार हो गई थीं। सभाओं और प्रभात फेरियों में ये रचनाएं गाई जाती थीं। स्वयं मैंने पिछले वर्ष दो-एक कवि-सम्मेलनों में श्री गोपालप्रसाद व्यास को 'नेताजी का तुलादान' नामक प्रसंग का पाठ करते सुना है और इससे हजारों की संख्या में लोगों को विभोर होते देखा है।
जैसा कि मैंने सूचित किया, यह एक खंडकाव्य है। खंडकाव्य के शास्त्रीय लक्षणों के हिसाब से इसे खंडकाव्य कहना ठीक न हो, किन्तु कुल मिलाकर एक कथांश अपने सामयिक तारतम्य के साथ हमें इसमें मिल जाता है और कथा का रस क्रमशः उद्दीप्त होते हुए एक चरम स्थिति तक पहुंचता है। जिस तरह खंडकाव्यों में मंगलाचरण की प्रथा है, उस तरह की प्रथा का निर्वाह भी इस पुस्तक में खूबी के साथ किया गया है। 'हिन्दुस्तान हमारा है' शीर्षक अध्याय एक तरह से भारत का वंदन है-

उठो हिमालय, आज तुम्हारे,
कौन पार जा सकता है ?
हिन्द महासागर की बोलो,
कौन थाह पा सकता है ?
आज़ादी की बाढ़ नहीं,
संगीनों से रुक सकती है !
अरे जवानी कभी नहीं,
जंजीरों से झुक सकती है !
गरमी की लपटों ने सोखी
कभी न बहती धारा है !
हिन्दुस्तान हमारा है !
हिन्दुस्तान हमारा है !

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