यारों के यार

(उपेन्द्रनाथ 'अश्क')  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

भाई गोपालप्रसाद व्यास से पहली मुलाकात की धुंधली-सी याद अब भी मेरे मन पर अंकित है। कदाचित्‌ 1937-38 की बात है, मैं एक प्रकाशक के भुलावे में आकर हिन्दी-कहानियों का एक संकलन करने के सिलसिले में इलाहाबाद-बनारस के दौरे पर निकला था और कुछ दिन दिल्ली रुका था। उन दिनों हिन्दी-साहित्य में जैनेन्द्र का रंग था। प्रेमचंद ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी (!) घोषित कर दिया था। पत्र-पत्रिकाओं में प्रेमचंदजी और उनमें होने वाला पत्र-व्यवहार भी छपा था-और हिन्दी कथा-साहित्य में जैनेन्द्र की तूती बोलती थी।
उन्हीं दिनों श्री जैनेन्द्र ने दिल्ली में एक साहित्य-परिषद का आयोजन किया था। उसमें दूर-दूर के साहित्यकार सम्मिलित हुए थे। सर्वश्री हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, चंद्रगुप्त विद्यालंकार आदि के साथ-साथ काका कालेलकर और मश्रूवाला भी उसमें आए थे। व्यास उन दिनों आगरा से निकलने वाले 'साहित्य संदेश' में संपादन-कार्य करते थे और उस परिषद् में वह भी दिल्ली आए थे। यहीं उनसे मेरी पहली मुलाकात हुई। मेरा पहला कविता-संग्रह उन दिनों निकला था। इस पर मेरी और व्यास की काफी बातचीत दिल्ली में हुई।
दूसरी बार सन्‌ 43 में व्यासजी से मेरी मुलाकात श्री जैनेन्द्र के यहां पुनः दिल्ली में ही हुई। वह 'साहित्य-संदेश' छोड़कर घूमते-घामते दिल्ली आ भटके थे और जैनेन्द्रजी के यहां ठहरे थे। शायद इन दोनों में यह समझौता हुआ था कि साथ लिखेंगे और आमदनी भी मिलकर बांट लिया करेंगे। लेकिन जैनेन्द्रजी के अपने आदर्शों और व्यासजी के तथाकथित व्यावहारिक सूत्रों के कारण दोनों में अधिक दिन नहीं पटी।
व्यासजी अपनी पत्नी को 'अजी सुनो' कहकर पुकारते हैं या नहीं, यह मैं नहीं जानता, लेकिन जैनेन्द्रजी भाभी को कभी नाम लेकर और कभी ऐसे ही पुकारते थे। जैनेन्द्रजी से अलग होने पर पत्नी को लेकर व्यासजी ने जो हास्य-रस की कविताएं लिखनी शुरू कीं वे 'अजी सुनो' के नाम से संगृहीत हैं। उनमें कहीं-कहीं मुझे लगा, जैसे उन्होंने स्वयं अपने साथ-साथ जैनेन्द्रजी को भी ध्यान में रखा है।
उन्हीं दिनों मैंने एक कविता लिखी- 'हम मिले'। मैं जिस कवि-सम्मेलन में जाता था, यही कविता पढ़ता। वह खासी लोकप्रिय हुई। उसका पहला छंद है-
हम मिले,
मुझे मालूम हुआ-
तुम तरुण नदी हो।
तूफानी,
अनजानी
गिरि-मालाओं में बहने वाली।
इठलाती, बल खाती, बहती
और बहाती-
पाषाणों को,
चट्टानों को,
गिरि के उर को चीर निकलती,
और मचलती,
चलती हो उद्दाम।
और मैं दरिया
चिर का चला,
थका और हारा,
मंथर गति से मैदानों में बहने वाला।
मौन और गंभीर, शांत
और श्रान्त
यौवन की सब याद भुला कर
लुटा-लुटा कर,
बहता हूं उद्भ्रांत !

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