हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा

(विष्णु प्रभाकर)  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

हिन्दी व्यंग्य-विनोद के मूर्धन्य लेखक, हास्य-रसावतार एवं वरिष्ठ हिन्दीसेवी पं. गोपालप्रसाद व्यास किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। साठ साल से भी अधिक हो गए हैं, उन्हें लिखते-छपते। उनकी पचास से अधिक महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं। व्यासजी हिन्दी के अत्यंत लोकप्रिय साहित्यकारों में हैं और आज भी लाखों की संख्या में उनके पाठक और श्रोता मौजूद हैं। व्यासजी ने साहित्य के क्षेत्र में एक लंबी पारी खेली है। खूब चौके-छक्के लगाए हैं और आज चौरासी-पचासी वर्ष की अवस्था में भी लगातार रन बना रहे हैं।
व्यासजी से मेरा परिचय बहुत पुराना है। सन्‌ 1943-44 के आसपास जब हम लोग दिल्ली आए तो देश की राजधानी कहलाने वाली दिल्ली में हिन्दी भाषा और साहित्य का कोई विशेष प्रभाव नहीं था। यदाकदा धार्मिक अवसरों पर कवि-गोष्ठियां हो जाया करती थीं। एकाध बार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन भी हुआ था। लेकिन उस समय आचार्य चतुरसेन शास्त्री और जैनेन्द्रकुमार के अतिरिक्त कोई बड़ा साहित्यकार दिल्ली में नहीं था। बाद में सर्वश्री गोपालप्रसाद व्यास, नगेन्द्र, विजयेन्द्र स्नातक आदि यहां आए। कुछ पुराने हिन्दी-सेवक उस समय दिल्ली में पहले से थे, जिनमें मुख्य रूप से सर्वश्री रामचंद्र महारथी, दीनानाथ भार्गव 'दिनेश ', अवनीन्द्रकुमार विद्यालंकार, पुत्तूलाल वर्मा 'करुणेश ' हिन्दी भाषा तथा साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय थे। इनमें एक चिरंजीत भी थे। इन सभी महानुभावों को साथ लेकर व्यासजी और मैंने बहुत से साहित्यिक कार्य किए।
सन्‌ 1945 में व्यासजी के सुझाव पर दिल्ली में अखिल भारतीय ब्रज साहित्य मंडल का वार्षिक अधिवेश न बड़े भव्य रूप में आयोजित किया गया। इस अधिवेशन में विशेष रूप से मिश्रबंधुओं में छोटे भाई तथा महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला उपस्थित हुए थे। इस अवसर पर लगातार दो दिन कवि-सम्मेलन हुए। दिल्ली में यह हिन्दी का पहला भव्य समारोह था। इस सफल अधिवेशन के पीछे व्यासजी की प्रेरणा और सूझबूझ थी तथा इससे दिल्ली में हिन्दी का वातावरण निर्मित हुआ। हिन्दीप्रेमियों में उत्साह एवं नवीन चेतना का संचार हुआ।
तत्पश्चात हम लोगों ने मिलकर 'श निवार समाज' नाम से एक साहित्यिक संस्था की स्थापना की। 'शनिवार समाज' के तत्वावधान में नियमित रूप से साहित्यिक गोष्ठियां होने लगीं। देश -विदेश के अनेक साहित्यकारों ने उसमें भाग लिया। तब हम लोगों का एक ऐसा दल बन गया जिसने दिल्ली में हिन्दी साहित्य और उसकी प्रतिष्ठा में चार चांद लगाए। व्यासजी की भूमिका 'शनिवार समाज' के सभी कार्यों में उल्लेखनीय थी।

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