वह मुझसे मिले बिना चले गए !

( डॉ0 रत्नावली कौशिक )   

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

कहां से शुरू करूं चाचाजी पर लिखना ? क्या यह कि गोवर्धन के पास के एक छोटे से गांव में जन्मा यह 'गुपाल' किस तरह मथुरा, मथुरा से बाबू गुलाबराय के पास आगरा और जैनेन्द्रजी के आमंत्रण पर आगरा से दिल्ली पहुंचा। या फिर पाठकों को बताऊं कि किस तरह धूल-रेत में मस्ती, पहलवानी करने वाला, जमुनाजी में कूद-कूदकर तैरने वाला, ग्यारह वर्ष की आयु में छंद-कवित्त और सवैये पढ़ने वाला यह बालक कैसे राजधानी ही नहीं, देशभर में छा गया। किस तरह 13-14 वर्ष की आयु में चवन्नी-अठन्नी और साथ में पत्नी को लेकर अपनी जीवन-यात्रा का आरंभ नितांत अभाव भरी परिस्थितियों में करके टीन की छतों के नीचे सोकर कैसे ये मथुरा का छोरा गांधीजी से लेकर नेहरूजी तक, शास्त्रीजी से लेकर इंदिराजी तक और अटलजी से लेकर आडवाणीजी तक सबके प्रेम का पात्र बना। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त और रामधारी सिंह 'दिनकर' उनके परम मित्र बने। राजर्षि टंडन से लेकर सेठ गोविन्ददास तक का विश्वास पात्र बने। पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उन्हें अपना आत्मीय बनाया। डॉ0 नगेन्द्र जैसे गंभीर समीक्षक के साथ वे चुहलबाजी किया करते थे। अमृतलाल नागर के साथ भांग-ठंडाई पी जाती थी। 'पद्मश्री' से लेकर 'शलाका पुरुष' और 'परंपरा' से लेकर 'यश-भारती' सम्मान से उन्हें नवाजा गया। या फिर बात करूं उनकी लोकप्रियता की। लालकिले के उस ऐतिहासिक कवि-सम्मेलन की जिसकी न केवल उन्होंने स्थापना की, बल्कि 30-35 वर्षों तक जनता के प्यार-दुलार और आदर के साथ उस पर एकछत्र राज्य किया।
चाचाजी द्वारा संचालित लालकिले के कवि-सम्मेलन में मैंने नेहरू, शास्त्री और बाबू जगजीवनराम जैसे लोगों को उदघाटन करते हुए देखा है। दिनकर, सुमित्रानंदन पंत, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, भगवतीचरण वर्मा, नरेन्द्र शर्मा, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', सोहनलाल द्विवेदी, शिवमंगल सिंह 'सुमन' और हरिवंशराय बच्चन जैसे कवियों को कविता पाठ करते हुए देखा है। बालकवि बैरागी, काका हाथरसी, नीरज से लेकर ओमप्रकाश आदित्य, सुरेन्द्र शर्मा, संतोष आनंद, गोविन्द व्यास, अशोक चक्रधर जैसे चर्चित नाम जो आज नज़र आते हैं, उनमें से अधिकांश मेरे पिता की देन या उनके शिष्य ही हैं। दरअसल, उस समय लालकिले के मंच पर निमंत्रण पाना सफल कवि होने की गारंटी माना जाता था।
जीवन जीने की चाचाजी की अपनी अलग शैली, अलग अदांज, अलग तरीका था। होली के दिन वे भागीरथ पैलेस के अपने घर से 'मूर्ख महासम्मेलन' निकाला करते थे। आज की पीढ़ी को यह बात शायद समझ न आए कि मूर्ख महासम्मेलन की इस बारात को देखने लाखों लोग घंटों रामलीला मैदान में इंतजार करते। बड़े-बड़े नेता, अभिनेता और प्रतिष्ठित लोग मूर्ख बने इस जुलूस में चलते। हाथ में डुगडुगी, गले में गोभी-गाजर की माला, सिर पर अजीबो-गरीब मुकुट पहने चाचाजी के साथ जब ये सवारी घर से निकलती तो दृश्य देखने योग्य होता था। लोगों के लिए भले ही यह मूर्ख सम्मेलन मोद-विनोद और चुटकियां लेने, हंसने-हंसाने का वार्षिक मेला होता होगा, पर चाचाजी के लिए उनके हाथ की डुगडुगी समाज और राज के बंदरों को आइना दिखाने का साधन थी।


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