चाचाजी

( श्रीमती पुष्पा उपाध्याय )   

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

'एजी कहूं कि ओजी कहूं', 'पत्नी को परमेश्वर मानो', 'साली की महिमा', 'सलवार चली' आदि सैकड़ों लोकप्रिय कविताओं के रचयिता, हिन्दी-जगत में हास्य-रस के आचार्य, 'यत्र-तत्र-सर्वत्र' तथा 'नारदजी खबर लाए हैं' स्तंभों के लेखक, दैनिक 'हिन्दुस्तान' के सह-संपादक, दिल्ली प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमंत्री, दिल्ली के लोकप्रिय 'मूर्ख महासम्मेलन' के आजन्म मंत्री और पद्मश्री की उपाधि से अलंकृत इस व्यक्ति के बारे में आज जब लिखने बैठी हूं, तब मन में एक अजीब-सी झिझक होती है। वह मेरे पिता हैं। जब कोई अपने किसी आत्मीय या संबंधी के बारे में लिखना या बोलना चाहता है, तब वह आत्मप्रशंसा-सी हो जाती है, फिर भी जिस व्यक्ति को हास्य-रस के प्रसिद्ध कवि तथा लेखक के रूप में आज हिन्दीप्रेमी जानते हैं, उसके पिता रूप का परिचय देने का मैं लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूं।
कितनी ही मनःस्थितियों में देखा है मैंने चाचाजी को-ठेठ तबसे, जब मैं बच्ची थी और अब, जब अपने विवाह के बाद मैं सैकड़ों मील की दूरी पर हूं-मुंबई में। मैं घर की बड़ी बेटी, अम्माजी और चाचाजी दोनों का भरपूर लाड़ मुझे मिला, अगर अम्माजी नाराज न हों तो कहूंगी कि प्यार तो चाचाजी ही ज्यादा करते हैं। इस हद तक कि अम्माजी नाराज होकर कहतीं- ''लड़की को बिगाड़ दिया। पराए घर जाएगी, मेरा क्या तुम्हारा ही नाम निकालेगी !'' चाचाजी हंसते हुए कहते- ''काम तो जिन्दगी भर करना है, यही तो खेलने-कूदने के दिन हैं।'' और इसी तरह दिन गुजरते थे।
बड़ा परिवार हो तो समस्याएं भी बड़ी होती हैं। लेकिन उन समस्याओं के बीच घिरे रहने पर भी चाचाजी को उदास शायद ही कभी देखा हो। कैसी भी परेशानी की बात हो, अगले ही क्षण किसी परिचित मित्र को फोन करेंगे और फिर तो वह कहकहे लगेंगे कि सारे घर का वातावरण खुश हो उठेगा। लगता है चाचाजी ने हास्य को नहीं अपनाया, हास्य ने चाचाजी को अपना लिया है।
कुछ और बड़ी हुई। अम्माजी ठहरीं धार्मिक और कुछ-कुछ पुराने विचारों की। कहतीं-''बेटी, सोमवार का व्रत किया कर, घर-वर अच्छा मिलेगा!'' तो चाचाजी कहते-''हां बेटी, व्रत जरूर करना, लेकिन एक दाढ़ का। सिर्फ एक तरफ से खाना।'' और फिर उस हंसी में घर में सभी लोग हिस्सा लेते, अम्माजी को छोड़कर । चाचाजी का स्वभाव ही ऐसा है। किसी से भी मजाक करने का कोई मौका उनसे छूटता नहीं। हर बात को वह मजाक में लेते हैं। लेकिन मजाक में टालते नहीं। घर में उन्मुक्त हास्य वातावरण होने का यह अर्थ नहीं कि बच्चों में उच्छृंखलता या अनुशासनहीनता आ जाए। यदि कभी ऐसा हो तो फिर उनका गुस्सा भी देखने ही लायक है।
खाने और खिलाने का चाचाजी को बहुत शौक है। शायद इसलिए कि मूलतः हम मथुरावासी हैं। सुबह होते ही चाचाजी के चेले-चपाटे घर में आने प्रारंभ हो जाते हैं और उनके दफ्तर जाने तक अड्डा जमाए रहते हैं।




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