मेरे गुरुदेव

( संतोषानंद )   

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

इकबाल का शेर है, "फिलसफी को फलसफे में है खुदा मिलता नहीं, डोर को सुलझा रहा है पर सिरा मिलता नहीं।" बात कहां से प्रारंभ करूं, कई रात से सोच रहा हूं। शायद सोच भी उस मुकाम पर पहुंच गई है, जहां वह मुझसे कह रही है कि तुझे सोचने की जरूरत क्या है ? तू तो उनके लिए सोच रहा है जिन्होंने जीवनभर तेरे लिए सोचा। बाल-बोध आज भी मन में है। मेरा सदैव से विचार रहा है कि यदि व्यक्ति अपने बचपन को उम्रभर जीता रहे तो वह सदैव ईश्वर के निकट रहता है। ईश्वर को मैंने देखा नहीं है। हर किसी ने ईश्वर की परिकल्पना भिन्न-भिन्न तौर पर अपने-अपने रंगों की तूलिका से की है। मैंने तो अपने ईश्वर के दर्शन अपने गुरुदेव पंडित गोपालप्रसाद व्यास में ही किए हैं। ईश्वर ध्वनि है, ईश्वर दृश्य है अथवा ईश्वर परिकल्पना है, मैं इन सब गंभीर बातों में नहीं जाता हूं। ईश्वर भंवरा भी है, ईश्वर कमल भी है, ईश्वर सूर्य भी है, ईश्वर चंद्रमा भी है। ईश्वर वह भी है जो मेरे सामने बैठा है, लेकिन मेरे भाव ने सदैव मुझसे कहा है कि रे, बावरे संतोषानंद। क्यों इधर-उधर भटक रहा है। आज तू जिसकी प्रतिच्छाया है, आज तेरे जीवन में जिसका जीवट है, आज जिसने तुझे संतोषानंद से 'संतोष-आनंद' बनाया तू कल भी उनकी परछाईं था और आज भी उनकी परछाईं है।
सन 1960 में दिल्ली आया था। तब तक मेरी बाईं टांग टूट चुकी थी। इसके बावजूद प्रतिदिन दस-बारह किलोमीटर चलना पड़ता था। एक छोटी सरकारी लाइब्रेरियन की नौकरी मिल गई थी। रहता किशनगंज था, बहिन के पास। नौकरी थी मातासुंदरी के पास। गाड़ी छूट जाए तो बस पकड़ो। बस छूट जाए तो गाड़ी पकड़ो, इसी भागदौड़ में चलने की कोशिश करता रहा। दिल्ली आने से पूर्व एक-दो छोटे-मोटे कवि-सम्मेलन किए होंगे। तब तक मैं कविता को कवि-सम्मेलन में मात्र जमने की चीज ही मानता था। पर हृदय में जो भी भाव उठते थे, उन्हें अपनी टूटी-फूटी भाषा में लिख लिया करता था। एक बार किसी परिचित ने तिमारपुर में हुई एक कवि-गोष्ठी में मुझे भी आमंत्रित किया। सौभाग्य से उस गोष्ठी की अध्यक्षता श्री भवानीप्रसाद मिश्र ने की। वे मेरे कविता-पाठ से अत्यंत प्रभावित हुए। तत्काल बोले, ''पंडित गोपालप्रसाद व्यास से मिलो ! मैं भी उनको बोल दूंगा।'' मैंने अपने हृदय में शरद की पूर्णिमा का आभास किया, क्योंकि मैं जबसे दिल्ली आया था-तभी से व्यासजी की खोज में था। लेकिन उनका व्यक्तित्व इतना विराट था कि मैं उनके निकट जाते हुए भय और संकोच दोनों को महसूस करता था। अब मुझे रास्ता मिल गया था। उस समय दैनिक 'हिन्दुस्तान' का कार्यालय कनाट सर्कस की एक बिल्डिंग में हुआ करता था। मैं बिना किसी पूर्व सूचना या पूर्वानुमति के ही उनके समक्ष जा खड़ा हुआ। मैंने देखा, धवल वस्त्रों में एक अजीब-सी मुस्कुराहट लिए हुए अपनी कुर्सी पर बैठे श्री व्यासजी जैसे अपने भीतर के आनंद को परमानंद का स्वरूप दे रहे हों।





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