आदरणीय गुरुदेव के प्रति

(काका हाथरसी)  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !











पढ़कर 'हिन्दुस्तान' में 'यत्र-तत्र-सर्वत्र'
श्रद्धा उमड़ी, लिख दिया हृदय खोलकर पत्र।
हृदय खोलकर पत्र, निष्कपट उत्तर पाया
लेकर पहुंचे रोरी-चावल और कलाया।
याद रहेगी जीवनभर वह स्वर्णिम बेला
गुरु बने श्री 'व्यास' होगए काका चेला।।

जादू-सा कुछ होगया, बदला अपना रंग
हास्य-व्यंग्य में नित नई उठने लगी तरंग।
उठने लगी तरंग, भाग्य ने पल्टा खाया
चमत्कार दिखलाने लगी गुरु की माया।
'काका' व्यंग्य-बाण जब सम्मेलन में छूटे
बल्ली हिलने लगी मंच के तख्ते टूटे।।

 

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