ब्रज की माधुरी और व्यासजी

( सोम ठाकुर )  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !
ब्रज-मंडल में जन्म लेकर यदि मनुष्य रसिक न हुआ तो उसका जीवन व्यर्थ ही है। 'ब्रज' शब्द के साथ माखन, मिसरी, पेड़े जुड़े हुए हैं और अबीर-गुलाल, पंचरंग चूनर पर पड़ती हुई पिचकारी की केसरिया फुहार। इसी वातावरण में रंगा हुआ एक व्यक्ति आगरा से निकलकर दिल्ली में रम गया। इसके व्यक्तित्व में समाहित विविध क्षमताओं के कारण साहित्यकार उसे नेता भी मानते थे और नेतागण साहित्यकार भी। अपने स्वभाव से ही इस व्यक्ति ने ट्रामों, बसों और स्कूटरों की हलचल से भरी दिल्ली के रंग-बिरंगे लोगों को हंसाना शुरू कर दिया। दिल्ली ने और फिर पूरे हिन्दुस्तान ने इसके इसी रूप को जाना और पहचाना। सम्मान की बाढ़ आई और उसकी लहरें राष्ट्रपति भवन की सीढ़ियों तक पहुंच गईं । मिस्र ने भारत के एक प्रतिनिधि कवि के रूप में जाना। लेकिन, क्या लोग इस बात को जानते हैं कि महाकवि जगन्नाथदास 'रत्नाकर' के इस गुरुभाई, गोपालप्रसाद व्यास की हास्य-धारा के पीछे इससे कहीं अधिक सशक्त एवं रसवंती ब्रज-माधुरी की स्रोतस्विनी प्रवाहित हो रही है। प्राचीन परिपाटी के अनुसार व्यासजी ने पिंगल-शिक्षा ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवि श्री नवनीत चतुर्वेदी द्वारा ग्रहण की थी। नायिका भेद, रस और अलंकार आदि के उदाहरण तथा लक्षण कंठस्थ किए एवं भेद-प्रभेदों को बड़ी सूक्ष्मता के साथ जाना-पहचाना। जब व्यासजी के कवि का प्रादुर्भाव हुआ था, उस समय कवियों में पढंत और समस्या-पूर्ति की परंपरा थी। उस समय व्यासजी देश के दो-तीन कवियों में एक थे, जिन्हें सहस्त्रों सवैये और कवित्त कंठस्थ थे। व्यासजी का कवि बारह वर्ष की अवस्था में सचेत हुआ। अब तक उनके द्वारा लगभग छह सौ रचनाएं केवल ब्रजभाषा में ही रची जा चुकी हैं। जिनमें से कुछ कविताएं 'रंग-जंग और व्यंग्य' नामक संग्रह में आ रही हैं। उनकी प्रतिभा केवल लोकोत्तर साहित्य के सृजन में ही सक्रिय नहीं रही, वरन उन्होंने होली की तानें, रसिए, चौबोले तथा ख्याल आदि भी बहुत लिखे, जो ब्रज-जनपद में आज भी गाए जाते हैं।
व्यासजी की ब्रजभाषा की रचनाएं अपने साथ ब्रजभाषा-काव्य की संपूर्ण परंपराओं को समेटे हुए हैं। भक्ति तथा नायक-नायिका वर्णन ब्रजभाषा-काव्य के अत्यंत महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। व्यासजी की कृतियों में इन दोनों विषयों का प्रचुरता के साथ आकलन किया गया है। वल्लभ संप्रदाय के अंतर्गत ब्रजभूमि को बहुत महत्व दिया गया है। उसकी मान्यता के अनुसार ब्रज की पावन रज के स्पर्श मात्र से मनुष्य भक्ति की भावनाओं से भर जाता है। हित हरिवंश ने राधा-कृष्ण की भक्ति में यमुना और वृंदावन को अनिवार्य रूप से स्तुत्य माना है। व्यासजी ने अपनी कुछ रचनाओं में इसी परंपरा को आगे बढ़ाया है। कवि का भक्ति-भाव उस पराकाष्ठा तक पहुंच गया है, जहां वह गंगा की अपेक्षा यमुना की महत्ता अधिक मानता है।
यम-यातना को नष्ट करने वाली यमुना की क्षमता के आधार पर निम्न पंक्तियों में उसकी गंगा से श्रेष्ठता सिद्ध की है-


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