कवि व्यास, हास्यरस के

(ओमप्रकाश आदित्य)  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !
'मेरे प्यारे सुकुमार गधे' किसी पुस्तक में कविता पढ़ी और सुकुमार गधे के सृजनकर्ता के दर्शन की उत्कंठा जगी। मन पर स्वतः एक चित्र अंकित हुआ, मुसकुराता हुआ, विचित्रताओं से भरा। यह मेरा प्रथम भावनात्मक परिचय था व्यासजी से, जो अंतर में हास्य-रस के सुकुमार सोते भावों को अपने पदांबुजों के मधुर आघात से गुदगुदा गया, आन्दोलित कर गया। अपनी विनोदमयी पुकार से अनायास जीवन की दुपहरी को जगा गया।
विश्वविद्यालय की ओर से आकाशवाणी भवन, दिल्ली जाने का अवसर मिला। स्नातकजी साथ थे। मैं और मेरे कई साथी छात्र प्रतीक्षा-कक्ष में बैठे गपशप में समय व्यतीत कर रहे थे कि गांधी टोपी के मुकुट से मंडित, तन्वंगी, सुललिता, सरला वंशकुमारी वेदवती के साथ खिलवाड़ करते, धोती-कुरते की शुभ्र छटा से पश्चिमी सभ्यता पर वज्र गिराते, किसी छैले की-सी, गबरूई रंगीली चाल चलते हुए एक ऐनकधारी अल्हड़ ने अधरों पर बिखरी तांबूल-लालिमा से प्रतीक्षा-कक्ष को जगमगा दिया। स्नातकजी उन्हें देखते ही कुर्सी से उछल पड़े -''आप यहां कहां ?''
''आपकी तलाश में,'' चट से उत्तर मिला।
स्नातकजी ने हमारी ओर मुखातिब होते हुए उत्सुकतापूवर्क कहा-''अरे, तुम इन्हें नहीं जानते, यही तो हैं रंगीले व्यासजी !'' व्यासजी का नाम सुनते ही मैं उछल पड़ा और मेरे भीतर उनका 'सुकुमार गधा' उनके दर्शनकर मन-ही-मन रीझने लगा।
स्नातकजी ने मुझे आगे बुलाकर मेरा उनसे परिचय कराया-''ये भी आपके पंथ के हैं-आप कहें तो एक कविता सुनवा दूं इनसे।'' ''अवश्य-अवश्य।'' खड़े-खड़े ही व्यासजी ने चबाए हुए पान को और भी सख्ती से चबाते हुए कहा। मैंने अपनी 'कवि-पंचायत' कविता सुनाई। व्यासजी ने कविता की प्रशंसा ही नहीं की, अपितु कभी अपने यहां आने का निमंत्रण भी दिया।
फिर व्यासजी से मिलने को कई बार उत्सुक हुआ, पर झिझककर रह गया, क्योंकि मैंने सुन रखा था कि कलाकारों का मिजाज कुछ कड़वा होता है, उनके स्वभाव का सिलसिला ऐसा अटपटा होता है, जो न जाने किस समय किसी से क्या कह-सुन दे। यदि ऐसा है तो व्यासजी का कैसा स्वभाव हो, कैसा बर्ताव हो ? पर रेडियो स्टेशन के थोड़ी देर के परिचय ने ही मुझे उनके स्वभाव और सज्जनता के प्रति इतना आश्वस्त कर दिया था कि यह आशंका अधिक बल नहीं पकड़ सकी, यद्यपि थोड़ी झिझक मन में अवश्य बनी रही। अधिक दिन तक मैं उनसे मिले बिना न रह सका और एक दिन साहस समेटकर उनके कार्यालय पहुंच ही गया। मैंने सोचा था कि रेडियो स्टेशन वाली मुलाकात को वह भूल गए होंगे, क्योंकि साहित्यकारों को मामूली लोगों से यदा-कदा हुए परिचय अक्सर कम ही याद रहा करते हैं। पर हाय री उनकी स्मरण-शक्ति, जाते ही मेरे नाम सहित मुझे पहचान लिया और स्नेहपूर्वक बिठाकर बड़े मजेदार मूड में बातें शुरू कर दीं, जैसे मैं उनसे प्रतिदिन मिलने-जुलने वाला कोई अत्यंत निकट का व्यक्ति हूं। उनके स्नेह, सरलता और विनोदी स्वभाव ने एक ही दिन में सारी झिझक दूर कर दी।
उस दिन के पश्चात तो व्यासजी का घर मेरे लिए विनोद-मन्दिर होगया और मैं उनके विशाल साहित्यिक-परिवार का एक आजीवन सदस्य बन गया। तबसे अब तक व्यासजी को मैंने जितने रूपों में और स्थितियों में देखा है, उन्हें अधिकांश अन्य कवि-कलाकारों से भिन्न पाया है ।


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