व्यास-ग़ज़लियों-तबलियों की महफिल में !

( चिरंजीत )  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

दिल्ली के गीतकारों का ग़ज़लिए-तबलिए जैसा नामकरण किसने किया, काफी खोज के बाद भी यह रहस्य नहीं खुला, परंतु अगली दो-तीन कवि-गोष्ठियों में यह बात बिलकुल स्पष्ट होगई कि व्यासजी ने गीतकारों को खदेड़कर दिल्ली में अपनी विजयी वैजयन्ती गाड़ दी है। यही नहीं, व्यासजी के हास्य-रस के दमामे ने उर्दू के नक्कारखाने को भी बंद कर दिया और हिन्दी-कविता रईसों के बैठकखानों से निकलकर मेंहदी की बजाय धरती की पावन धूल से रंजित होकर जनता के कंधों पर बैठकर लालकिले के दीवाने आम में पहुंच गई।
सन्‌ 1945 में व्यासजी की हास्य-रस की कविताओं का पहला संग्रह 'उनका पाकिस्तान' प्रकाशित हुआ था। उसमें भदंतआनंद कौसल्यायन ने व्यासजी को अत्यंत लोकप्रिय कवि मानकर लिखा था- ''व्यासजी की कविताओं की विशेषता है कि उन्होंने दूसरों के सिर पर होली नहीं खेली है। समाज की गहरी चुटकियां ली हैं, उसे चिकोटियां काटी हैं, किन्तु सभी अपने को ही निशाना बनाकर। इस प्रकार का साहित्य हिन्दी में लगभग है ही नहीं।''

बीस वर्ष पहले कही गई यह बात आज चौगुनी सच्चाई के साथ प्रमाणित हो चुकी है। आज व्यासजी हिन्दी के अद्वितीय हास्य-कवि के रूप में अखिल भारतीय एवं राजकीय स्तर पर प्रतिष्ठित हो चुके हैं। उनके काव्य-सृजन को 'पत्नीवाद' तक ही सीमित करके देखना उपयुक्त नहीं। वैसे उनके 'पत्नीवाद' का भी कम महत्त्व नहीं। परकीयावाद से लांछित हिन्दी-काव्य को उन्होंने पारिवारिक पवित्रता, शालीनता और स्वस्थ शिष्टता प्रदान की है। परंतु इस पारिवारिक सीमा से आगे बढ़कर व्यासजी का काव्य आज के जीवन के परिवेश एवं परिप्रेक्ष्य में सामाजिक तथा राष्ट्रीय भावभूमियों पर यह अपना एक सटीक महत्त्व रखता है। मैं तो समझता हूं कि समसामयिक हास्य-व्यंग्य की दृष्टि से अंग्रेजी जगत में जो महत्त्व दिल्ली के 'शंकर्स वीकली' और लंदन के 'पंच' का है, वही महत्त्व व्यासजी के काव्य का समूचे हिन्दी-जगत में है।
खैर, बात शुरू हुई थी दिल्ली के ग़ज़लियों-तबलियों की महफिल से। उस सामंतवादी मनोरंजन की परंपरा को समाप्त करके व्यासजी ने दिल्ली में जो सशक्त जनवादी परम्परा स्थापित की है, उससे हिन्दी तो गौरवान्वित हुई ही, स्वयं व्यासजी भी कम गौरवान्वित नहीं हुए। 'पद्मश्री' की उपाधि के बाद देखिए इस गौरव का विस्तार और कहां तक होता है। 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' के इस वर्ष के होली विशेषांक में मैंने श्री गोपालप्रसाद व्यास को पद्मश्री की उपाधि से विभूषित होने पर 'होलिकानन्द' के छद्म नाम से जो भावांजलि अर्पित की थी, उसी को अब खुलेआम दुहराता हूं-

पत्नी को प्रभु मानकर खूब रचाई रास।
पद्मश्री होगए महाभारती व्यास॥


('व्यास-अभिनन्दन ग्रंथ' से, सन्‌ 1966)



पृष्ठ-3

| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
1    2    3
   | वेब निर्माण टीमः हैश नेटवर्क |