व्यास-ग़ज़लियों-तबलियों की महफिल में !

( चिरंजीत )  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !
श्री व्यासजी ग़ज़लियों-तबलियों की महफिल में पहुंचे और वहां कुछ वैसी ही हालत हुई जैसी कि दक्ष-यज्ञ में क्रुद्ध-क्षुब्ध शिवजी के अचानक पहुंचने पर हुई थी। फर्क सिर्फ इतना ही था कि जहां शिवजी ने अपने कंधे पर सती का शव उठा रखा था, वहां व्यासजी ने अपने हृदय में आगरे के नामी हिन्दी-सेवी बाबू गुलाबराय की मरखनी 'डबल भैंस' का मनोरम चित्र सजा रखा था। यह सनसनी पूर्ण घटना द्वापर युग में नहीं, इसी कलियुग के सन्‌ 1944 में मेरी आंखों के सामने भारत की राजधानी दिल्ली में घटित हुई, जब महाभारती व्यास श्री गोपालप्रसाद व्यास के रूप में भरतखंड पर अवतरित हो चुके थे। सन्‌ 1940 के अंत में मैं जब पंजाब से आकर दिल्ली का स्थायी निवासी बना, तब यहां उर्दू का बोलबाला था। मुगलकाल से चली आ रही उर्दू-परंपरा को उर्दू-लेखकों के गढ़ 'दिल्ली रेडियो स्टेशन' की उर्दूपरस्ती ने जैसे नया जीवन दिया। उर्दू के उस नक्कारखाने में जनभाषा हिन्दी की आवाज थी तूती की तरह। देखते-देखते यह आवाज कुछ तेज होगई, क्योंकि एकाएक पुरानी दिल्ली में कवि-समाज की मढ़ैया में विभिन्न दिशाओं से आए हिन्दी-गीतकारों का अच्छा-खासा जमाव होगया। ब्रजभाषा की गीति-परम्परा के उन्नायक श्री वियोगी हरि तो पहले से ही यहां मौजूद थे। मेरी प्रसिद्धि भी पहले-पहल गीतकार के रूप में ही हुई। आज के यशस्वी साहित्याचार्य एवं आलोचक डॉ0 नगेन्द्र भी उन्हीं दिनों सर्वप्रथम गीतकार के रूप में ही सामने आए। परंतु गीतकारों के उस जमाव में सर्वश्री डॉ0 नगेन्द्र, पीयूष और मुझे छोड़कर अधिक संख्या थी 'ईश' मार्का कवियों की- जैसे छवेश, दिनेश, करुणेश, विमलेश, कमलेश, सुमनेश, ईश इत्यादि। उर्दू से हटकर हिन्दी में ग़ज़लें लिखने वाले स्व0 'शेष' भी तुक के नाते इसी 'ईश' मार्का जमात के सदस्य थे।

कालान्तर में श्री रंग के रंग में रंगे 'नीरज' के भी संगीत में बोल फूट पड़े। पहले उर्दू के प्रभुत्व के कारण दिल्ली में केवल मुशायरों का ही बोलबाला था, परंतु अब कवि-समाज के गीतकारों के कारण कवि-गोष्ठियों और छोटे-छोटे कवि-सम्मेलनों की भी परंपरा चल पड़ी और यह परंपरा धीरे-धीरे जोर पकड़ती गई। दिल्ली के रईसों के पुराने सामंती ठाठ के स्मारक स्वरूप बैठकखानों, धर्मशालाओं के सहनों, कालिज के हॉलों और बाग-बगीचों में गीतकारों की महफिलें जमने लगीं। प्रतिवर्ष शरद पूर्णिमा की रात को दूध से नहाई यमुना की थिरकती लहरों पर नौका-विहार के रूप में दूधिया कवि-गोष्ठी होती। सन्‌ 1944 तक दिल्ली के गीतकारों की धूम बम्बई से लेकर कलकत्ते तक मच गई। दिल्ली के गीतकार जैसे आकाश में उड़ने लगे। सन्‌‌ 1944 की बात है। एक रात दिल्ली के नामी-गिरामी गीतकारों की एक शानदार महफिल एक कालिज के हॉल में जमी। संयोजकों ने उस आधुनिक कालिज में भी मंच को दिल्ली के पुराने सामंती ढंग से सजाया था। गुदगुदे गद्दों पर दुग्ध-श्वेत चांदनी, उस पर सफेद गुदगुदे मसन्‌द कवियों के गलों में मोतिया के श्वेत हार, चांदी के थालों में पान, इलायची और मिसरी तथा समूचे हॉल में अगरबत्तियों की भीनी-भीनी सुगंध।

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