व्यासजी- मेरे बालसखा

(भारतभूषण अग्रवाल)  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !
यों तो व्यासजी मुझसे बड़े हैं, क्योंकि वह तो पूरा अर्द्धशतक बना चुके हैं और मैं पैंतालीस के आस-पास चल रहा हूं और वह जब भी मुझे कोई पुस्तक भेंट करते हैं तो मेरे नाम के पहले 'चिरंजीव' लगाना नहीं भूलते और बिन्दुजी को व्यास-पत्नी बहू ही मानती हैं, फिर भी व्यासजी बचपन से ही मुझे अपना मित्र और सखा मानते रहे हैं। इसे मैं उनकी उदारता ही समझता हूं और जब वह आज के बाल-नवयुवकों को भी बराबरी का दर्जा देने लगते हैं तो मुझे कोई ताज्जुब नहीं होता। व्यासजी से मेरा परिचय अपने बड़े भाई (श्री विद्याभूषण अग्रवाल) की ही मार्फत हुआ। मथुरा में हम लोगों का घर गली सतघड़ा में था और व्यासजी का घर उसी के पास दशावतार गली में था (व्यासजी ने जो ख्याति प्राप्त की है उसके बल पर, हो सकता है, कभी कोई विनोदी मित्र मथुरा नगरपालिका में यह प्रस्ताव भी रख दे कि अब उस गली का नाम एकादशावतार हो जाना चाहिए) और संयोग से दोनों की रुचि साहित्य में होने के कारण दोनों में बड़ा मेल-जोल भी था। इसी मेल का फल था वह क्लब, जो व्यासजी ने सन्‌ 27 में चालू किया और जिसका नाम उन्होंने 'बाल-नवयुवक क्लब' रखा। मथुरा की डंडेशाही से जो लोग परिचित हैं, उन्हें यह बात मज़ेदार लगेगी कि सन्‌ 30 के आस-पास एक डंडेशाही में इस क्लब ने भी भाग लिया था। मलमल के सफेद बुर्राक कुरते पहनकर, दुपल्लियां ओढ़े, गले में फूलों की माला डाले, पान से मुंह और होंठ रचे, हाथों में चिकने-चिकने डंडे लेकर जब हम सबने मिलकर यह गीत गाया था- "सन्‌ 27 में शुरू हुई यह बी0 एन0 क्लब हमारी
बी0 एन0 क्लब हमारी, रे भाइयो बी0 एन0 क्लब हमारी।"
मैं सोचता हूं क्लब का नाम 'बाल-नवयुवक क्लब' रखने में व्यासजी का यही उद्देश्य रहा होगा कि उसमें मैं भी सम्मिलित हो सकूं, क्योंकि मैं बाकी सब सदस्यों से उम्र में तीन-चार साल छोटा था और किसी भी हालत में नवयुवक नहीं कहला सकता था। उस क्लब की ओर से व्यासजी ने अपने मन्दिर में एक पुस्तकालय भी चलाया, जिसमें सब सदस्यों ने अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार पुस्तकें दान में दीं और एक हस्तलिखित पत्रिका भी प्रकट हुई, पर वह जोश कुछ ही दिनों बाद ठंडा होगया। इतिहास में इस बात के अनेक उदाहरण मिलते हैं कि बड़ी-बड़ी क्रांतियां प्रारंभिक असफल प्रयोगों से ही उत्पन्न होती हैं। इस दृष्टि से मैं 'बी0 एन0 क्लब' को बेकार नहीं मान सकता, क्योंकि वह चाहे असफल रहा हो, पर उसी ने व्यासजी को वह प्रारम्भिक अनुभव दिया, जिसके बल पर उन्होंने बाद में अखिल भारतीय ब्रज-साहित्य मंडल और दिल्ली प्रादेशिक हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन जैसी भारत प्रसिद्ध संस्थाओं को अग्रसर किया। कहने को तो व्यासजी कुछ दिनों मेरे सहपाठी भी थे, शायद कक्षा 7 में, पर कक्षा में उनके सख्य का अब मेरे मन में कोई संस्मरण नहीं। न यही याद है कि उस कक्षा के बाद उन्होंने पढ़ना क्यों छोड़ दिया ! जो बात अब तक याद है वह यह है कि साहित्य में व्यासजी की रुचि गहरी थी।

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