गोपाल के गोपाल

( गोपालदास 'नीरज' )  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !
पद्मश्री गोपालप्रसाद व्यास से मेरा प्रथम परिचय 1942 की गर्मियों में हुआ था, जब मैं एटा में अपनी हाईस्कूल की परीक्षा समाप्त कर अपनी मां के पास इटावा रहने के लिए आया था और नौकरी की तलाश में था। कविता करने का रोग तब मुझे लग चुका था और कविता पर चर्चा करने और सुनने के लिए शाम को अक्सर ही
श्री नारायण स्वामी की चाय की दुकान पर आया करता था। उस समय स्वामीजी की दुकान इटावा के सभी कवियों-पत्रकारों और राजनीतिज्ञों का स्थायी अड्डा था, जहां पर हर समय कोई न कोई गरमागरम बहस छिड़ी होती थी। वहां अक्सर श्री देवीलाल दुबे-संपादक-देशधर्म (तब जनमत) कवि श्री वल्लभजी, शिशुजी, गोपालकृष्ण कौल, गिरराजेशजी, किशनलाल जैन आदि कवियों तथा पत्रकारों से भेंट हो जाया करती थी। एक दिन एक दुबले-पतले, हंसोड़ तथा मजाकिया किस्म के आदमी से भेंट हुई। पता चला कि मथुरा से आए हुए ये हास्यरस के कवि
श्री गोपालप्रसाद व्यास हैं। प्रथम परिचय में ही व्यासजी ने अपनी बातचीत और अपने व्यक्तित्व से मुझ पर गहरा प्रभाव छोड़ा। फिर थोड़े दिनों बाद मुझे पता चला कि व्यासजी दिल्ली चले गए हैं और देखिए नियति का संकेत कि 4 नवम्बर, 1942 को मुझे भी दिल्ली के एक सरकारी दफ्तर में टाइपिस्ट की नौकरी मिल गई।
दिल्ली में थोड़े दिनों बाद एक कवि-सम्मेलन में व्यासजी तथा कौलजी से मुलाकात हुई। इन दिनों दिल्ली में श्री शंभुनाथ शेष, करुणेशजी तथा श्री चिरंजीत की कविताओं की धाक थी। धीरे-धीरे इनके बीच
श्री व्यासजी, श्री गोपालकृष्ण कौल और मुझ नाचीज का भी स्थान बनने लगा। फिर तो व्यासजी और मेरा साथ दिल्ली से बाहर के अनेक आयोजनों में होने लगा। उन दिनों हास्यरस के क्षेत्र में सर्वाधिक लोकप्रिय व्यासजी ही थे और जिस कवि-सम्मेलन में वे भाग लेने जाते वहां से सर्वाधिक तालियां अपनी झोली में भरकर लाया करते थे। मैं प्रत्येक रविवार को पंचकुइयां स्थित अपने क्वार्टर से पैदल चलकर गली खातियान स्थित उनके निवास पर जाया करता था। यह टीन का एक टूटा-फूटा मकान था। जब भी मैं व्यासजी के घर जाता- हमारी भाभी यानी श्रीमती व्यास कभी तो मुझे गरमागरम परांठे और कभी घी चुपड़ी रोटियों का सुस्वाद भोजन करवातीं। उन रोटियों और पराठों की सुगंध आज भी मन में बसी हुई है। वह सुगंध कभी भी कम नहीं हुई और न होगी, क्योंकि घी की सुगंध के साथ-साथ अन्नपूर्णा जैसी हमारी भाभी के स्नेह और वात्सल्य की खुशबू भी उसमें मिली हुई थी। इन्हीं भाभी पर कविताएं लिखकर व्यासजी ने पत्नीवाद चलाया और हास्यरस की कविता में एक नया रस घोला-पति-पत्नी की नोंक-झोंक का।
उन दिनों कवि के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए आवश्यक था कि आपकी कोई काव्यकृति भी प्रकाशित होकर सामने आए। सौभाग्य से नई सड़क स्थित फॉरवर्ड बुक डिपो के मालिक श्री अमीरचंद मेरे बड़े प्रशंसक थे- उन्होंने मेरे मन की हर बात जानी और 'संघर्ष' नामक मेरा काव्य-संग्रह प्रकाशित किया। जिसकी भूमिका
श्री गोपालप्रसाद व्यास ने लिखी और जिसे अपने आशीष-वचनों से श्री गुलाबराय, एम.ए. ने भी गौरवान्वित किया। मैंने अपनी यह प्रथम कृति श्री बच्चनजी को समर्पित की थी, क्योंकि इन कविताओं पर उनका काफी प्रभाव था।

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