नारद के पिता : व्यास

(डॉ0 प्रभाकर माचवे)  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

पुराणों में नारद और व्यास का क्या रिश्ता है, इसे तो पुराणवेत्ता ही जानें। पर व्यास के मानस-पुत्र नारद ( पद्मश्री ) गोपालप्रसाद ने हमें मोह में डाल दिया है। यों व्यासजी का नाम दिल्ली में और हिन्दी में दो चीजों के लिए हमेशा याद किया जाएगा। एक तो कवि-सम्मेलनों की संयोजना के लिए, दूसरे 'नारदजी' या 'कवि-पत्नी' जैसे अमर हास्य-चरित्रों की सृष्टि के लिए।
परसों व्यासजी का फोन आया। विजयादशमी के अवसर पर लालकिले के सामने मैदान में आयोजित वीररस कवि-सम्मेलन में (जो व्यासजी ने दिल्ली प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के लिए आयोजित किया था) रक्षामंत्री चौव्हाण और जनरल चौधरी को राष्ट्रीय रक्षा-कोष और जवानों के परिवारों के लिए ग्यारह लाख ग्यारह हजार रुपए एक रात में जमा करा दिए। मैं सुनकर अवाक्‌ रह गया। धन्य है महिमा वीररस की, हिन्दी कविता की और व्यासजी की !
हम बराबर 'नारदजी खबर लाए हैं' यह हास्य-व्यंग्य का स्तंभ 'हिन्दुस्तान' (दैनिक) के रविवासरीय में पढ़ते हैं। इलाहाबादी 'अमृत-पत्रिका' में शुरू-शुरू में आठ-नौ महीने हम भी 'बाबा लोकनाथ' के नाम से एक स्तंभ लिखते थे-गुमनाम। पर यह कमाल की बात है कि पिछले दस वर्षों से बराबर हर हफ्ते बराबर एक कालम लिखते रहना। और वह भी हास्य का, बेनागा, हर बार नए विषय पर ! और ऐसा कि न पढ़ने वाला, न लिखने वाला, 'बोर' हो। यह कालम '' अब के कवि-खद्योतसम 'लालटेन' हैं व्यास'', जैसों का ही चमत्कार है। आजकल किरासीन की कमी है, तो लालटेन जरा कम जलती है, पर हास्य-रस के ब्लैक आउट में फिर जरूरत शायद पड़ जाए, उन्हीं पुरानी बत्तियों की। अमरीका में जिसे 'पॉप' आर्ट कहते हैं (यानी पॉपुलर आर्ट या लोकप्रिय कला का संक्षिप्त रूप) वैसी ही हिन्दी-कविताएं व्यासजी ने हिन्दी में उपस्थित कीं।
हम उन्हें पच्चीस साल से जानते हैं। जब साहित्य-संदेश में वह सहसंपादक थे, उन्होंने हमारा एक लेख पूना के हिन्दी साहित्य सम्मेलन (सन्‌ 1939) के साहित्य परिषद के अध्यक्षीय भाषण का प्रतिवाद 'साहित्य-संदेश' के पहले पृष्ठ पर छापा था। बाद में तो साहित्य सम्मेलनों के अलावा 'शनिवार समाज' और 'मूर्ख महासम्मेलन' में, 'हिन्दुस्तान' कार्यालय और लालकिले पर तथा कई जगह उनके अनेक बार दर्शन और आकाशवाणी पर अनेक बार श्रवण के अवसर प्राप्त हुए। सूरदास की नगरी के होने से उनकी दृष्टि अब शायद उतनी तीक्ष्ण नहीं रही और उन्हें हमारे दर्शन के अवसर कम-कम होने लगे हैं। यद्यपि 'दर्शन' का अध्ययन मैंने किया था, इधर व्यासजी से हमारी दृष्टिक्षीणता सानुपातिक समानता प्राप्त कर रही है। यानी दोनों के चश्म-ब-चश्मे हैं। अब दिल्ली जैसे साहित्यिक तीर्थ में व्यास जैसों से बच पाना बहुत मुश्किल है। तीर्थों में तो 'आर्या' हूं कहकर बच निकल सकते हैं, पर व्यासजी से बचने का कोई उपाय नहीं। उनकी नज़र दूर तक पहुंच जाती है। उनके मानस-पुत्र 'नारद' की तरह वह त्रिकालदर्शी हैं। एक उदाहरण दूं। 15 अगस्त, 1964 को कांस्टीट्यूशन क्लब में राष्ट्रीय कवि-सम्मेलन था। भी हिन्दी पढ़ना पड़ रहा है।''


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