जो नियति से भी नहीं हारा

(डॉ0 पद्मसिंह शर्मा 'कमलेश')  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

हास्य-रस के सिद्ध कवि भाई गोपालप्रसाद व्यास से मेरा परिचय सन्‌ 1938 के अक्तूबर के महीने में तब हुआ, जब वह मथुरा से आगरा हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन की उत्तमा (साहित्यरत्न) परीक्षा में प्रविष्ट होने के लिए आए थे और बंधुवर श्री विद्याभूषणजी अग्रवाल (उच्चाधिकारी, आकाशवाणी, मुंबई) के यहां आकर रुके थे। उस समय यह मेधावी इसी परीक्षा की तैयारी में लगा था और विद्याभूषणजी के घर पर ही मिलकर पढ़ा करता था। विद्याभूषणजी तब सेंट जॉन्स कालेज, आगरा के गिने-चुने मेधावी छात्रों में विख्यात थे और अंग्रेजी-साहित्य के गंभीर अध्येता भी। मैं तब प्राइमरी स्कूल में शिक्षक था। लेकिन काव्य और साहित्य के प्रति अभिरुचि ने मुझे विद्याभूषणजी का स्नेह-भाजन बना दिया था। वह स्वयं भी हिन्दी-साहित्य में गहरी पैठ रखते थे। नित्य की भांति एक दिन सायंकाल जब मैं विद्याभूषणजी के घर पढ़ने गया तो देखा कि उनकी बैठक में कुर्ता और धोती पहने एक साधारण-सा युवक बैठा है, जो अपनी बातचीत के ढंग से शुद्ध ब्रज का नमूना जान पड़ता था। मुझे देखते ही विद्याभूषणजी ने कहा- ''आओ, आज एक और सहपाठी से परिचय करा दूं।'' और इतना कहकर उन्होंने उस युवक का नाम 'गोपालप्रसाद व्यास' बताया। साथ ही कहा- ''यह भी तुम्हारी ही तरह स्वनिर्मित है। प्रेस में कम्पोजीटरी करता है और काव्य और साहित्य में यशोर्जन की तीव्र अभिलाषा संजोए है।'' मैं स्वयं हॉकरी छोड़कर अध्यापक बना था और महत्त्वाकांक्षा मुझे भी चैन नहीं लेने देती थी। अतः अपने जैसे ही एक और साथी को पाकर मुझमें आत्मविश्वास पहले से कहीं अधिक गहरा हो गया।
'साहित्यरत्न' की परीक्षा का परिणाम घोषित होने के कुछ दिन बाद देखा कि व्यासजी 'साहित्य संदेश' के सहायक संपादक के रूप में आगरा आकर रहने लगे हैं। 'साहित्य संदेश' से मेरा संबंध उसके जन्म से ही रहा है। कारण, उसके जनक आदरणीय श्री महेन्द्रजी की स्निग्ध छाया में ही मेरे जीवन का कैशोर्य हरा-भरा रह सका और मैं अध्यापक होने पर भी कृतज्ञतावश उनकी प्रत्येक योजना में अपना विनम्र सहयोग देकर सुख का अनुभव करता था। 'साहित्य संदेश' के लिए पुस्तक-समीक्षा लिखना और अन्य लिखने वालों तक समीक्षार्थ पुस्तकें पहुंचाने और उनकी समीक्षा लाकर देने का कार्य मैं अध्यापन कार्य से अवशिष्ट समय में करता रहता था। यहां यह कहना भी अप्रासंगिक न होगा कि आदरणीय महेन्द्रजी, उनका 'साहित्यरत्न भण्डार' और 'साहित्य संदेश' प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से साहित्यिकों के निर्माण का अविस्मरणीय कार्य




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