हास्य के क्षेत्र में व्यासजी का योगदान

(डॉ0 विजयेन्द्र स्नातक)  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

काव्यशास्त्र प्रणेता आचार्यों ने हास्यरस को सामान्य विनोद-वृत्ति का उत्पादक होने के कारण प्रमुख रस के रूप में स्वीकार नहीं किया। श्रृंगार, वीर और करुण के समान हास्यरस की गंभीर स्थिति न होने से कदाचित उत्फुल्लकारी, आनंददायक रस की ओर ध्यान न जाना है भी स्वाभाविक। किंतु हास्य की विशद-व्यापक परिधि को देखते हुए तथा इसके सुखद परिणाम पर दृष्टिपात करते हुए यह रस अवहेलना करने योग्य नहीं है। हास्यरस का मन से सीधा संबंध है। मन को इंद्रियों का सारथी और ग्यारहवीं इंद्रिय स्वीकार किया गया है। मन के माध्यम से सारे शरीर पर हास्य का स्वस्थ प्रभाव पड़ता है। रोम-रोम में आनंद और उल्लास की लहर जगाने वाला यह रस 'आवाल-वृद्ध-वनिता' सभी के जीवन में, आयु की सभी दशाओं में, व्याप्त रहता है। यह रस अकेले भी उमंग से मन को तंरगायित करता है और समष्टि रूप से भी सामाजिकों को चमत्कृत करने की शक्ति रखता है। इसका संबंध चतुरालाप के साथ है। कथन का योग और चटकीलापन हास्य में विद्यमान रहने वाले अपरिहार्य गुण हैं। चित्त विस्फार के साथ काया को रोमांचित करना इस रस की विशेषता है। हास्य रस की परिणति विनोद के मनोरम वातावरण में ही होती है। एक व्यक्ति अनेक व्यक्तियों को उल्लसित करने की क्षमता इसी रस से ही प्राप्त करता है।
स्मरण रखना चाहिए श्रृंगार आदि रस तो मनुष्येतर प्राणियों में भी पाए जाते हैं, किंतु हास्यरस मनुष्य के साथ के संबद्ध है। पशु-पक्षी, कीट-पतंग मनुष्य के समान हंसकर अपने हर्षोल्लास की अभिव्यक्ति नहीं कर सकते। मनुष्य को जिस प्रकार अपने विवेक पर गर्व है वैसे ही हंसने की क्रिया पर भी उसे गर्व है। हास्यरस को शास्त्र में पुरुषत्व धर्म से युक्त और शुभ्र वर्ण का इसीलिए स्वीकार किया गया है कि प्रमथ नामक देवता इसका स्वामी है और वह सबको उज्ज्वल भाव से संयत कर प्रसन्न रखता है। हास्य जीवन की किसी एक सीमित विशिष्ट स्थिति तक आबद्ध नहीं है। सभी वयस्‌ और स्थितियों के व्यक्ति इस रस का आनंद उठाते हैं। संसार में जहां कहीं विचित्रता, असम्बद्धता, कुतूहलता और विस्मय होगा वहीं हास्य चुपके से आकर अपना रंग जमा लेगा। हास्य रस का सफल कवि वही माना जाएगा जो जीवन के विविध क्षेत्रों से विचित्रता, विद्रूपता, असम्बद्धता और व्यंग्यात्मकता की खोज निकालने में समर्थ होगा। केवल हंसाना ही हास्य रस का धर्म नहीं है। इसके द्वारा व्यंग्य, कटाक्ष, कशाघात और कचोटने का काम भी लिया जाता है। हंसी के हलके-फुलके वातावरण में सामाजिक रूढ़ियों और अन्य विश्वासों पर जैसा मार्मिक प्रहार होता है वैसा न तो कटाक्ष द्वारा संभव है और न धार्मिक उपदेश की परंपराबद्ध प्रणाली से।


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